- साधना एक पराक्रम है, संघर्ष है, जो अपनी ही दुष्प्रवृत्तियों से करना होता है।
- दैवी शक्तियों के अवतरण के लिए पहली शर्त है- साधक की पात्रता, पवित्रता और प्रामाणिकता।
- सज्जनों की कोई भी साधना कठिनाइयों में से होकरनिकलने पर ही पूर्णहोती है।
- असत से सत् की ओर, अंधकार से आलोक की और विनाश से विकास की ओर बढ़ने का नाम ही साधना है ।
- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन् ।(कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में कभी भी नहीं ) गीता
- असतो मा सदगमय ।। तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ मृत्योर्मामृतम् गमय (हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो । अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो ।। मृत्यु से अमरता की ओर लेचलो ॥।
- एक साधना जिसे करने के लिए हम आपको अनुरोधपूर्वक प्रेरित करते हैं-वह हैं दिन-रात में से कोई भी पन्द्रहमिनट का समय निकाले और एकान्त में शान्तिपूर्वक सोचे कि वे क्या हैं ? वे सोचे कि क्या वे उस कर्तव्य को पूराकर रहे हैं, जो मनुष्य होने के नाते उन्हे सौपा गया था। मन से कहिए कि वह निर्भीक सत्यवक्ता की तरह आपके अवगुण साफ-साफ बतावें।
- ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने का एकमात्र उपाय हैं - साधना।
- सिद्ध सरहपा के अनुसार ध्यान की सिद्धि को परखने के निम्न मानदण्ड बताये हैं। (1) आहार संयम (2) वाणी कासंयम (3) जागरुकता (4) दौर्मनस्य (द्वेष) का न होना (5) दु:ख का अभाव (6) श्वासों की संख्या में कमी हो जानासंवेदनशीलता । उक्त सात मानदण्डो से कोई भी साधक कभी भी अपने को जांच सकता हैं कि उसकीध्यान-साधना कितनी परिपक्व और प्रगाढ हो रहीं है।
- विवाह एक आध्यात्मिक साधना हैं। यह एक ऐसी प्रेम वल्लरी हैं जिसका अभिसिंचन त्याग और उत्सर्ग की उच्चभावना से किया जाता है।
- चिन्तन में उपासना, चरित्र में साधना और व्यवहार में आराधना का समावेश करने में पूरी-पूरी सतर्कता औरतत्परता बरती जाये।
- जिस दिन आत्मा को परमात्मा का बोध हो जाये उस दिन आपकी साधना फलितार्थ हो जायेगी।
- पुस्तकों का अध्ययन ऐसी साधना हैं, जिससे मनुष्य अपने अन्तबाह्य जीवन का पर्याप्त विकास कर सकता है।
- पूज्य गुरुदेव गायत्री महामंत्र के माध्यम से ऋतम्भरा प्रज्ञा और वर्चस की साधना करते थें। इन होनो ही तत्वों कोवे अपने आत्मदेवता में समाविष्ट मानते थें। उनका मत था कि जिसने अन्त:करण को तपोवन बना लिया व वहॉएकनिष्ठ होकर ब्रह्मचेतना से तादातम्य स्थापित करने का प्रयास किया वही सच्चा साधक है।
- श्रद्धा, विश्वास, साहस, धेर्य , एकाग्रता, स्थिरता, दृढता और संकल्प ही वे तत्व हैं, जिनके आधार पर साधनाएंसफल होती है।
- श्रेष्ठ विचारों के चिन्तन-मनन की साधना वस्तुत: मस्तिष्कीय क्षैत्र में घुसे मनोविकारों को, दुष्प्रवृतियों को निरस्तकरने के लिये लड़ा जाने वाला महाभारत हैं। जो इसमें सफल होते हैं, वे ही सच्चे अर्थो में जीवन का आनन्द उठातेहुए आत्मोत्कर्ष का परम लाभ प्राप्त करते हैं।
- शब्द से नि:शब्द में छलांग लगाने का साहस ही साधना है।
- ज्ञानयज्ञ इस युगका सबसे बडा यज्ञ हैं। ज्ञानदान से बढकर आज की परिस्थितियों में और कोई दान नही। ज्ञानसाधना ही इस युग की सबसे बडी साधना है।
- सबसे विकट तपोवन अपना अन्त:करण ही हैं, यही एकनिष्ठ होकर ब्रह्मचेतना में तादातम्य स्थापित करने का जोप्रयत्न किया जाता हैं, वही सच्ची साधना है।
- साधन हमारे बहिरंग जीवन को सम्पन्न बनातें हैं, साधना हमारे अन्तरंग जीवन को पवित्र बनाती है।
- साधना की सीढियॉ हैं-उपासना, आत्मशोधन, परमार्थ।
- साधना का अर्थ है-अपने को अनगढ से सुगढ बनाना।
- साधना हमारे अन्तरंग जीवन को पवित्र बनाने की कला है।
- साधना हमें सकारात्मक व रचनात्मक बनाती है।
- सादा जीवन-उच्च विचार आत्मवादी की प्रथम साधना है।
- सद्ञान की उपासना का नाम ही गायत्री साधना है।
- स्वाध्याय युक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
- उपासना शरीर हैं, साधना प्राण हैं।
- उपासना और साधना का फलितार्थ अराधना में होता हैं। आराधना स्वयं को व्यापक बनाने, विराट पुरुष से स्वयं कोएकात्म करने की कला है।
- देवत्व साधना से मिलता है।
- व्यक्तित्व के आयामों को समझना, उन्हे प्रकाशवान बनाना ही तो जीवन-साधना की डगर पर पहला कदम है।
- व्यवहार से ही मनुष्य के व्यक्तित्व की गहरी परतें अभिव्यक्त होती हैं। इसे सर्वथा अपनी जीवन साधना की मर्यादाएवं गरिमा के अनुरुप होना चाहिये।
- तप की शक्ति प्रचण्ड हैं, उसके बल पर ही अध्यात्म जगत के सारे काम चलते है। तप की पूंजी जहॉं हो, वहॉ उतनीही विजय मिलेगी। तप के बिना केवल बाहृ साधनो से कोई बडी सफलता प्राप्त नही की जा सकती।
- जीवन साधना का अर्थ हैं-अपने समय, श्रम और साधनों का कण-कण उपयोंग करना।
- जीवन साधना नकद धर्म हैं। इसके प्रतिफल के लिये लम्बी प्रतीक्षा नहीं करनी पडती।
- जीवन-साधना का अर्थ हैं- अपने गुण, कर्म, स्वभाव को साध लेना।
- जो जीवन साधना की डगर पर चलने के लिये उत्सुक एवं इच्छुक हैं, उन्हे अपने पहनावे के प्रति जागरुक होनाचाहिये।
- अध्ययन से थोडा ज्ञान ही होगा लेकिन साधना से समग्र ज्ञान हो जाता है।
- अपना आन्तरिक स्तर परिष्कृत करना ही सर्वश्रेष्ठ तप-साधना है।
- अपने गुण कर्म स्वभाव का शोधन और जीवन विकास के उच्च गुणों का अभ्यास करना ही साधना है।
- आध्यात्मिक साधनाएं बरगद के वृक्ष की तरह घीरे-धीरे बढती हैं, पर से होती टिकाउ है।
- अन्त:करण की सुन्दरता साधना से बढती है।
- अन्त:करण को कषाय-कल्मषों की भयानक व्याधियों से साधना की औषधि ही मुक्त कर सकती है।
- गायत्री साधना मात्र जीभ से मंत्रोच्चारण करने से नहीं, महानता के आदर्शो को जीवन-यात्रा का एक अंग बनाने परसम्पन्न होती हैं। इसके लिए जहॉ व्यक्ति का चिन्तन सही रखने के लिए आहार सही होना जरुरी हैं, वहीं श्रेष्ठविचारों को आमिन्त्रत करने की कला भी उसे सीखनी होगी, तभी ध्यान सफल होगा।
- ब्रह्मवर्चस का अर्थ है-ब्रह्म विद्या व व्यावहारिक तप साधना का समन्वय, अध्यात्म तथा विज्ञान का समन्वय, सिद्धान्त व व्यवहार का समन्वय।
- ब्राह्मण जन्म से नहीं जीवन-साधना से बना करते है।
- मधुर वचन बोलना व्यक्तित्व की गरिमा बढाने वाली साधना हैं।
- धेर्य साधना क्षेत्र में अति अनिवार्य है।
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Monday, September 1, 2008
साधना
सफलता-असफलता
- आत्मविश्वास हो तो सफलता की मंजिल दूर नही |
- कार्य की अधिकता से उक्ताने वाला आदमी कभी कोई बड़ा कार्य नही कर सकता है |
- जो आदमी अपने रहस्य को छुपाये रखता है, वह अपनी कुशलता अपने हाथ मे रखता है |
- उत्तम आदमी की यह खासियत होती है की वह किसी भी काम को अधुरा नही छोड़ते है |
- आदमी सफलता से कुछ नही सीखता, विफलता से बहुत कुछ सीखता है |
- जो दूसरों को धोखा देना चाहता है, वास्तव में वह अपने आपको ही धोखा देता है ।
- आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता है, पर निराशावादी प्रत्येक अवसर में कठिनाइयाँ ही खोजता है ।
- वर्तमान की श्रेष्ट कार्यो से ही श्रेष्ट भविष्य बनता है |
- जिसे सीखने की भूख है वह प्रत्येक आदमी और घटना से सीख लेता है |
- कोई भी कठिनाई क्यों न हो, अगर हम सचमुच शान्त रहें तो समाधान मिल जाएगा ।
- सच्ची लगन तथा निर्मल उद्देश्य से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जाता ।
- असफलता यह बताती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया गया।
- जो कभी भी कहीं असफल नही हुआ वह आदमी महान नही हो सकता ।
- असफलता आपको महान कार्यों के लिये तैयार करने की प्रकृति की योजना है ।
- असफलता फिर से अधिक सूझ-बूझ के साथ कार्य आरम्भ करने का एक मौका मात्र है ।
- दूसरों को असफल करने के प्रयत्न ही में हमें असफल बनाते हैं।
- आत्मविश्वास , सफलता का मुख्य रहस्य है ।
- मैने सीखा है कि किसी प्रोजेक्ट की योजना बनाते समय छोटी से छोटी पेन्सिल भी बडी से बडी याददास्त से भी बडी होती है ।
- आरम्भ कर देना ही आगे निकल जाने का रहस्य है ।
- शुभारम्भ, आधा खतम ।
- निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है । — प्रेमचन्द
- किसी बालक की क्षमताओं को नष्ट करना हो तो उसे रटने में लगा दो । — बिनोवा भावे
- लगन और योग्यता एक साथ मिलें तो निश्चय ही एक अद्वितीय रचना का जन्म होता है ।
- लडखडाने के फलस्वरूप आप गिरने से बच जाते हैं ।
- जिस काम की तुम कल्पना करते हो उसमें जुट जाओ। साहस में प्रतिभा, शक्ति और जादू है। साहस से काम शुरु करो पूरा अवश्य होगा।
क्या करें ? क्या न करें ?
- श्री कृष्ण को प्रणाम करके यदि यात्रा प्रारंभ की जाए तो विजय प्राप्त होती है|
- सेवा करके भूल जाओ |
- जब भी आप उदास हो तब ॐ का उच्चारण करे |
- जब परिस्थितिया विपरीत हो तो सब कुछ भगवान पर छोड़ दो |
- जब कुछ सन्देह हो , लिख लो ।
- हमें वह परिवर्तन खुद बनना चाहिये जिसे हम संसार मे देखना चाहते हैं ।
- आत्मदीपो भवः । ( अपना दीपक स्वयं बनो । ) — गौतम बुद्ध
- आओं हम मौन रहें ताकि फ़रिस्तों की कानाफूसियाँ सुन सकें ।
- छोटा आरम्भ करो , शीघ्र आरम्भ करो ।
- ईश्वर से प्रार्थना करो, पर अपनी पतवार चलाते रहो।
- एक समय मे केवल एक काम करना बहुत सारे काम करने का सबसे सरल तरीका है ।
- चींटी से परिश्रम करना सीखें |
- रचनात्मक कार्यों से देश समर्थ बनेगा । — श्रीराम शर्मा , आचार्य
- सारी चीजों के बारे मे कुछ-कुछ और कुछेक के बारे मे सब कुछ सीखने की कोशिश करनी चाहिये |
- हँसते हुए जो समय आप व्यतीत करते हैं, वह ईश्वर के साथ व्यतीत किया समय है।
- यदि बुद्धिमान हो , तो हँसो ।
- जब मैं स्वयं पर हँसता हूँ तो मेरे मन का बोझ हल्का हो जाता है | -– टैगोर
- सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, सत्य किन्तु अप्रिय नहीं बोलना चाहिये । प्रिय किन्तु असत्य नहीं बोलना चाहिये ; यही सनातन धर्म है ॥
- वही उन्नति करता है जो स्वयं अपने को उपदेश देता है।
- यदि आपको रास्ते का पता नहीं है, तो जरा धीरे चलें |
- दो बच्चों से खिलता उपवन । हँसते-हँसते कटता जीवन ।।
- धरती पर है स्वर्ग कहां – छोटा है परिवार जहाँ।
- स्वतंत्र वही हो सकता है जो अपना काम अपने आप कर लेता है। –विनोबा
- चिड़ियों की तरह हवा में उड़ना और मछलियों की तरह पानी में तैरना सीखने के बाद अब हमें इन्सानों की तरह ज़मीन पर चलना सीखना है। - सर्वपल्ली राधाकृष्णन
- सोचना, कहना व करना सदा समान हो।
- यदि किसी असाधारण प्रतिभा वाले आदमी से हमारा सामना हो तो हमें उससे पूछना चाहिये कि वो कौन सी पुस्तकें पढता है ।
- नरम शब्दों से सख्त दिलों को जीता जा सकता है | – सुकरात
- यदि आप इस बात की चिंता न करें कि आपके काम का श्रेय किसे मिलने वाला है तो आप आश्चर्यजनक कार्य कर सकते हैं ।
- मानसिक बीमारियों से बचने का एक ही उपाय है कि हृदय को घृणा से और मन को भय व चिन्ता से मुक्त रखा जाय । — श्रीराम शर्मा , आचार्य
- को रुक् , को रुक् , को रुक् ? हितभुक् , मितभुक् , ऋतभुक् । ( कौन स्वस्थ है , कौन स्वस्थ है , कौन स्वस्थ है ? हितकर भोजन करने वाला , कम खाने वाला , इमानदारी का अन्न खाने वाला )
- मानसिक शक्ति का सबसे बडा स्रोत है - दूसरों के साथ सकारात्मक तरीके से विचारों का आदान-प्रदान करना ।
- एकता का किला सबसे सुरक्षित होता है। न वह टूटता है और न उसमें रहने वाला कभी दुखी होता है । –
- हँसमुख चेहरा रोगी के लिये उतना ही लाभकर है जितना कि स्वस्थ ऋतु ।
- अपनी आंखों को सितारों पर टिकाने से पहले अपने पैर जमीन में गड़ा लो |
- वहाँ मत देखो जहाँ आप गिरे। वहाँ देखो जहाँ से आप फिसले.
- बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह होता है कि ध्यानपूर्वक यह सुना जाए कि कहा क्या जा रहा है।
- बिना जोश के आज तक कोई भी महान कार्य नहीं हुआ।
- सुभाष चंद्र बोस - जो मनुष्य एक पाठशाला खोलता है वह एक जेलखाना बंद करता है।
- सच्ची बात को स्वीकार करना मनुष्य का धर्म है।
- प्रेम करो सब से, नफरत न करो किसी से।
- आराम हराम है।
जीवन
- समय बर्बाद मत करो क्योंकी जीवन उससे ही बना है |
- निराशा से जीवन के बहुमूल्य तत्व नष्ट हो जाते है |
- जीवन के प्रकाशवान् क्षण वे हैं, जो सत्कर्म करते हुए बीते ।
- जीवन का आनन्द गौरव के साथ, सम्मान के साथ और स्वाभिमान के साथ जीने में है ।
- जीवन साधना का अर्थ है- अपने समय, श्रम और साधनों का कण-कण उपयोगी दिशा में नियोजित किये रहना ।
- उत्कृष्ट जीवन का स्वरूप है-दूसरों के प्रति नम्र और अपने प्रति कठोर होना ।
- वही जीवित है, जिसका मस्तिष्क ठण्डा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है ।
- जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं । पहले वे जो सोचते हैं पर करते नहीं , दूसरे वे जो करते हैं पर सोचते नहीं ।
- जीवन में हमारी सबसे बडी जरूरत कोई ऐसा व्यक्ति है , जो हमें वह कार्य करने के योग्य बना दे , जिसे हम कर सकते हैं ।
- व्यावहारिक जीवन की उलझनों का समाधान किन्हीं नयी कल्पनाओं में मिलेगा , उन्हें ढूढो ।
- सम्पूर्ण जीवन ही एक प्रयोग है । जितने प्रयोग करोगे उतना ही अच्छा है ।
- हर दिन नया जन्म समझें , उसका सदुपयोग करें ।
- धर्म, सत्य और तप-यही जीवन की सार संपत्ति है।
- यदि कभी मालूम करना हो कि व्यक्ति में आध्यात्मिक जीवन कितना विकसित हुआ हैं तो यह परखो कि उसकी संकल्प शक्ति कितनी विकसित हुई है।
- यदि हम अपना जीवन श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने विचारों , संकल्पो को श्रेष्ठ बनाना आवश्यक हैं। यही बीज हैं जिससे कर्म रुपी वृक्ष निकलता है।
- यदि जीवन में सुखी रहना चाहते हों तो हमेशा भलाई करो।
- यदि आस्तिकता कभी जीवन में फलित होगी तो व्यक्ति कर्तव्य पालन को सबसे पहले महत्व देगा।
- यज्ञ हमारा तभी सफल, जब जन जीवन बने बिमल।
- ऊंचे विचार लाने के लिये सादा जीवन आवश्यक है।
- ईश्वर से पाना और प्राणियों में बॉटना, इसी में सच्ची सम्पन्नता, समर्थता और जीवन की सच्ची सार्थकता है।
- बूंद-बूंद से सागर बनता हैं और क्षण-क्षण से जीवन। बूंद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है और क्षण को जो पा ले, वह जीवन को पा लेता हैं। क्षण में शाश्वत की पहचान ही जीवन का आध्यात्मिक रहस्य है।
- बगीचे में फूल खिलते हैं, वातावरण सुगन्धित हो जाता हैं। मन में उत्तम विचार खिलते है, जीवन सुगन्धित हो जाता हैं। यही सुगन्धित जीवन हमारा लक्ष्य हो।
- कर्म, भक्ति एवं ज्ञान :- भक्ति एवं ज्ञान से विमुख कर्म केवल महत्वाकांक्षा की पूर्ति का साधन व जीवन में भटकन का पर्याय बन कर रह जाता हैं। इसी तरह कर्म एवं ज्ञान से विमुख भक्ति कोरी भावुकता बन जाती हैं और यदि ज्ञान, कर्म एवं भक्ति से विमुख हो, तो कोरी विचार तरंगे ही पल्ले पडती है। जो मात्र दिवास्वपनो की सृष्टि करती रहती है।
- कर्मकाण्ड और पूजा पाठ की श्रेणी में साधक तभी आता हैं, जब उसका जीवन क्रम उत्कृष्टता की दिशा में क्रमबद्ध रीति से अग्रसर हो रहा हो और क्रिया कलाप में उस रीति-नीति का समावेश हो जो आत्मवादी के साथ आवश्यक रुप से जुडे रहते है।
- कहा जाता हैं कि जीवन में दु:खो से संघर्ष करने के लिये साहस चाहिये। वास्तविकता यह हैं कि साहसी व्यक्ति तक दु:ख पहुंचता ही नहीं।
- कायर अपने जीवन काल में ही अनेक बार मरते हैं, वीर लोग केवल एक बार ही मरते है।
- बोध की अवस्था में जिन्दगी बोझ के बजाय शिक्षालय बन जाती हैं। हर कहीं से ज्ञान का अंकुरण होता है। जो बोध में जीता है, वह सुख के क्षणों का सदुपयोग करता हैं। उसे दु:ख के क्षणों का भी महत्तवपूर्ण उपयोग करना आता हैं। सुख के क्षणों को वह योग बना लेता है तो दु:ख के क्षण उसके लिए तप बन जाते है। प्रत्येक अवस्था में उसे जीवन की सार्थकता की समझ होती है।
- ब्राह्मणत्व एक साधना हैं मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान हैं।इस साधना की ओर उन्मुख होने वाले क्षत्रिय विश्वामित्र और शुद्र ऐतरेय ब्राह्मण हो जाते हैं। साधना से विमुख होने पर ब्राह्मण कुमार अजामिल और धुंधकारी शुद्र हो गये। सही तो हैं जन्म से कोई कब ब्राह्मण हुआ हैं ? ब्राह्मण वह जो समाज से कम से कम लेकर उसे अधिकतम दे। स्वयं के तप, विचार और आदर्श जीवन के द्वारा अनेको को सुपथ पर चलना सिखाये।
- कल्पना मानवीय चेतना की दिव्य क्षमता हैं। यही वह शक्ति हैं, जिसके प्रयोग से मनुष्य देह-बन्धन में रहते हुए भी असीम और विराट तत्त्व से संपर्क कर पाता है। इसी के उपयोग से उसके जीवन में नई अनुभूतियों के द्वार खुलते है, चेतना में नवीन आयाम उदघाटित होते है। इन्हीं से नवसृजन के अंकुर फूटते है। कलाओं की सृष्टि होती है, अनुसंधान की आधारशिला रखी जाती है। उपलब्धियॉं लौकिक हो या अलौकिक, इनके पथ पर पहला पग कल्पनाओं के बलबूते ही रखा जाता है।
- क्लेश का कारण इच्छा और परिस्थिति के बीच प्रतिकूलता को होना ही है। विवेकवान लोग इन दोनो में से किसी को अपनाकर उस संघर्ष को टाल देता हैं और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है।
- मृत्यु एक महोत्सव हैं। इस तथ्य को वही समझ पाता हैं, जिसने अपने सम्पूर्ण जीवन त्याग, सेवा, आदर्श, सचाई और सदचिन्तन को अपनाया-आत्मसात किया।
- महानता के दो आधार, सादा जीवन उच्च विचार।
- मानव जीवन का मन्थन करने पर जो अमृत निकलता हैं, उसका नाम आत्म गौरव है।
- मानव जीवन का परम पुरुषार्थ हैं-अपनी निकृष्ट मानसिकता से त्राण पायें।
- मानव जीवन मे आधी गलतियॉ तो केवल मात्र इसलिये हो जाती हैं कि जहॉं हमें विचार से काम लेना चाहिये वहॉं हम भावना से काम लेते हैं और जहॉ भावनाओं की आवश्यकता रहती हैं वहॉं विचारों को अपनाते हैं।
- मनुष्य बुद्धिमानी का गर्व करता हैं, पर किस काम की वह बुद्धिमानी, जिससे जीवन की साधारण कला, हंस खेल कर जीने की प्रक्रिया भी हाथ न आये।
- मनुष्य चौरासी लाख योनियों में घूमते-घूमते उन सारे-के-सारे प्राणियों के कुसंस्कार अपने भीतर जमा कररके लाया हैं, जो मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक नहीं हैं, वरद् हानिकारक है। तो भी वे स्वभाव के अंग बन गये हैं और हम मनुष्य होते हुए भी -पशु-संस्कारो से प्रेरित रहते हैं और पशु प्रवृत्तियों को बहुधा अपने जीवन में कार्यान्वित करते रहते है। इस अनगढपन को ठीक कर लेना, सुगढपन का अपने भीतर से विकास कर लेना, कुसंस्कारो को, जो पिछली योनियों के कारण हमारे भीतर जमे हुए हैं, उनको निरस्त कर देना और अपना स्वभाव इस तरह का बना लेना, जिसकों हम मानवोचित कर सकें- साधना है।
- मनुष्य जीवन का लक्ष्य ईश सत्ता में प्रवेश करना है।
- मनुष्य जीवन के समय को अमूल्य और क्षणिक समझ कर उत्तम से उत्तम काम में व्यतीत करना चाहिये। एक क्षण भी व्यर्थ नहीं बिताना चाहिये।
- मनुष्य जीवन पाकर जिसने ज्ञान की कतिपय बूंदे इकट्ठी न की , उसने मानो इस रतन को मिट्टी के मोल खो दिया।
- किसी सद्उद्धेश्य के लिये जीवन भर कठिनाइयों से जूझते रहना ही महापुरुष होना है।
- किसी आदर्श के लिये हंसते-हंसते जीवन का उत्सर्ग कर देना सबसे बडी बहादुरी है।
- किवदंतिया वे ही बनते हैं, जो जीवन के प्रत्येक क्षण से सीखने की क्षमता रखते है।
- शिक्षक वह हैं, जो छात्रों को सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि जीवन के संघर्ष में सफल होने का गुरुमन्त्र और रास्ता भी बताता है।
- विषमताओं का यदि समुचित सदुपयोग किया जा सके तो जीवात्मा पर चढें हुए जन्म-जन्मांतर के कषाय-कल्मष धुलते है। प्रवृत्तियों का परिष्कार होता हैं - आंतरिक शक्तियों में निखार आता हैं । इसलिए जीवन में विषम क्षणों के उपस्थित होने पर इनसे घबराने की बजाय इनके सदुपयोग की कला सीखनी चाहिए।
- विश्वास जीवन हैं, संशय मौत है।
- विचारों में तो सभी आदर्शवादी होते हैं। योग्य-अयोग्य का ज्ञान या पुण्य-पाप की अनुभूति तो मूर्ख और पापी को भी होती हैं, किन्तु व्यावहारिक जीवन में हम उसे भूल जाते हैं। धर्म को जानते हुऐ भी उसमें प्रवृत्त नहीं होते और अधर्म को जानते हुए भी उससे निवृत्त नहीं होते।
- चिन्ताओं से दूर भाग्यशाली ही इस जीवन का आनन्द ले सकता है।
- चिन्तन बहुतों ने सिखाया हैं, पर ऐसे बहुत कम मिले, जो चिन्तन को जीवन में उतारना सिखा पाते।
- जिस व्यक्ति को समय का मूल्य नहीं मालूम, वह जीवन में क्या कर सकता है।
- जिस तरह प्रकाश को जानने के लिये नेत्रों की आवश्यकता हैं, उसी तरह तत्व ज्ञान प्राप्त करने के लिये ज्ञान और विवेक की आवश्यकता हैं, जिसके बिना हमारा जीवन व्यर्थ है।
- जिसकी दिनचर्या अस्त-व्यस्त हैं वह अपने जीवन में भी भूला-भटका रहता है।
- जिसने आज दिया वही कल देगा। जिसने आज दिया हैं , वह कल भी देगा। वह कल भी देगा- वह कौन है ? परमात्मा ? नहीं, तुम्हारा पुण्य है। इस संसार में जो भी सुख-सुविधा मिलती है वह सब पुण्य से ही मिलती है। पुण्य ही दिलाता हैं और पुण्य ही जिलाता हैं संसार में अगर कोई मॉं-बाप हैं तो पुण्य ही हैं। वही हमारा पालनहार है। इसलिए अपने जीवन में पुण्य का संचय करते रहो। जहॉ से भी मिले पुण्य लूटते रहो। पुण्य का खजाना खाली न होने पाये। इस बात का विशेष ख्याल रखना। पूरे दिन में कम से कम दो पुण्य काम जरुर करो। पाप तो दिनभर में सेकडो हो जाते हैं, पर पूरे दिन में कम से कम दो पुण्य जरुर करो। इससे हमारा ना सिर्फ यह जीवन सम्भलेगा अपितु इसके बाद का जीवन भी सम्भल जायेगा। यह जीवन का महत्त्वपूर्ण सूत्र हैं जिसे जीकर हम जीवन को सार्थकता दे सकते है।
- निरुद्धेश्य जीवन काट डालना लज्जा एवं कलंक भरी बात है।
- निस्वार्थ सेवा से उपजा सुख जीवन की भीषणतम कठिनाईयों के समय भी आनन्द की अनुभूति प्रदान करता है।
- निर्दोषता जीवन का आहार हैं और दोष जीवन का विकार हैं आहार लो, विकार त्याग दो। निर्दोषता ही पोषण हैं, वही जीवन है।
- हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को जीवन में उतारे।
- हम प्यार करना सीखें, हममें, अपने आप में, अपनी आत्मा और जीवन में, परिवार में, समाज में और ईश्वर में, दसों-दिशाओं में प्रेम बिखेरना और उसकी लौटती प्रतिध्वनि का भाव-भरा अमृत पीकर धन्य हो जाना, यही जीवन की सफलता हैं।
- हमारा परिधान सभी को इस बात की सूचना दे सके कि हम राजनीतिक रुप से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रुप से भी स्वतंत्र हैं और हमारी भारतीय जीवन मूल्यों में आस्था है।
- हमें नियमित रुप से सद्ग्रन्थो का अवलोकन करना चाहिये, उत्तम पुस्तको का स्वाध्याय जीवन का आवश्यक कर्तव्य बना लेना चाहिये।
- भय जीवन का सबसे बडा शत्रु है।
- भविष्य में जीवन खोजने वाले अपने वर्तमान से हमेशा असंतुष्ठ, असंतृप्त बने रहते है।
- भारत एक आध्यात्मिक राष्ट्र हैं। यहॉं के राष्ट्रीय जीवन की समस्याओं का समाधान , भावी चुनौतियों का उत्तर आध्यात्मिक आंदोलनो से ही निकलेगा। आध्यात्मिक जागरण भारत में राष्ट्रीय जागरण की पहली और अनिवार्य शर्त हैं। भारतीय समाज का सामुहिक मन आध्यात्मिकता में रचता-बसता है।
- पडित/संत-जो शास्त्रों के पीछे दौडता हैं, वह पंडित है। और जो सत्य के पीछे दौडता है, वह संत है। पंडित शास्त्रो के पीछे दौडता है। जबकि संत के पीछे शास्त्र दौडतें हैं। शास्त्र पढकर जो बोले वह पंडित और सत्य पाकर जो बोले वह संत हैं। पंडित जीभ से बोलता है, संत जीवन से बोलता हैं, जिसका जीवन बोलने लगे, वह जीवित भगवान है।
- परमपिता परमेश्वर आपकी जीवन-साधना को परिपक्व और प्रखर करे। आपकी अन्तर्निहित शक्तिया जाग्रत हो। जीवन सफलता और समृद्धि की ओर अग्रसर होता रहे। यश एवं कीर्ति के गान जिंदगी के आंगन में गूंजते रहे। उल्लास और उमंगो की नई तरंगो का स्पर्श मिलता रहे। आंतरिक प्रसन्नता व संतोष से अंत:करण का हर कोना सुवासित होता रहे। ऐसी मंगलकामना।
- पारिवारिक आनन्द के लिए गहन अन्तस्तल से निकलने वाले सदभाव की आवश्यकता हैं और इसे केवल वे ही उपलब्ध कर सकते हैं जो स्वयं उदार, सहृदय और सेवा भावनाओ से परिपूर्ण हो। परिवार में स्वर्गीय वातावरण का सृजन केवल जीवन विद्या के आदर्श ही कर सकते है।
- पूर्व अवस्था में वह कार्य करें,जिससे वृद्ध होकर सुख पूर्वक रह सके और जीवन पर्यन्त वह कर्म करें, जिससे मरकर परलोक में सुखपूर्वक रह सके।
- प्रमादपूर्ण जीवन संसार की सारी बुराइयों और व्यसनों का जन्मदाता है।
- प्रामाणिकता मानव जीवन की सबसे बडी उपलब्धि है। वह उत्तरदायित्व निबाहने, मर्यादाओ का पालन करने और कर्तव्यपालन में सतत् जागरुक रहने वालो को ही मिलती है।
- प्राचीन महापुरुषों की जीवन से अपरिचित रहना जीवन भर निरन्तर बाल्य अवस्था में रहना है।
- प्रेम ही आत्मा का प्रकाश है, जो इस प्रकाश मे जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं उसके संसार में शूल नहीं फूल नजर आता है।
- ज्ञान और चरित्र मानव जीवन की कसौटी है।
- संयम जीवन की ऊर्जा के बिखराव एवं विनाश हो रोकता हैं। अनुशासन इसे अपने लक्ष्य की ओर नियोजित करता हैं। दोनो का संगम जीवन को उर्ध्वगामी दिशा देकर आत्मसम्मान को प्रत्यक्ष रुप से बढाता है।
- संसार की सर्वोत्कृष्ट विभूति सदबुद्धि एवं सत्प्रवृति हैं उसे प्राप्त किये बिना किसी का जीवन सफल नहीं हो सकता है।
- समय और श्रम जीवन देवता की सौपी अमूल्य अमानते है।
- सदभावनाओं व सत्प्रवृत्तियों से जिनका जीवन ओतप्रोत हैं, वह ईश्वर के उतना ही निकट है।
- स्वयं में देखे :-मैं कितना सहनशील, विचारशील, दीनबन्धु, राग-द्वेष शून्य, साहसी एवं ओजस्वी हूं। जिस शुभ काम को करने में इतर जनक कॉपते हैं उसी कार्य को मैं किस साहस और बुद्धिमता के साथ पूरा करता हूँ। त्याग का भाव कैसा हैं ? देश सेवा में कितनी रुचि हैं ? आत्मसंयम कितना हैं ? बाह्य विषय-त्याग कैसा हैं ? आत्माभिमुखता कैसी हैं ? इन्ही गुणों का निरीक्षण स्वयं में करना चाहिए। यही गुण मनुष्य जीवन को सफल करने वाले हैं। इन्ही के सहारे मनुष्य नर से नारायण हो सकता है।
- स्वाध्याय को जीवन में निश्चित स्थान दो।
- स्वावलम्बन और सहयोगात्मक उ़द्योग दोनो नागरिक जीवन की कुन्जी है।
- सुगन्ध के बिना पुष्प, तृप्ति के बिना प्राप्ति, ध्येय के बिना कर्म व प्रसन्नता के बिना जीवन व्यर्थ है।
- सत्संग जीवन का कल्प वृक्ष है।
- सत्तातन्त्र का भटकाव देशवासियों को राष्ट्रीय जीवन के प्रति हताशा उत्पन्न करता है।
- उद्योग, साहस, धेर्य, बुद्धि शक्ति और पराक्रम - ये छ: गुण जिस व्यक्ति के जीवन में हैं, देव उसकी सहायता करते है।
- उठो, जागो और तब तक कठोर तप में निरत रहो, जब तक कि जीवन लक्ष्य स्वयं आकर तुम्हे वरण न कर ले।
- उपासना सच्ची तभी हैं, जब जीवन में ईश्वर घुल जाये।
- उस जीवन को नष्ट करने का हमें कोई अधिकार नहीं हैं जिसको बनाने की शक्ति हममें न हो।
- उत्कृष्ट जीवन का स्वरुप हैं - दूसरों के प्रति नम्र और अपने प्रति कठोर।
- उतावलापन जीवन को असफल बनाने वाला एक भयंकर खतरा है।
- दुर्गुण जीवन के लिये साक्षात् विष हैं। उनसे अपने को इस प्रकार बचाये रहना चाहिये, जैसे मॉ बच्चे को सर्तकता पूर्वक आग से बचाये रखती है।
- व्यक्ति के गुण, कर्म व स्वभाव का उत्कृष्ट होना ही उसकी आन्तरिक महानता का परिचायक हैं। अपने दैनिक जीवन में हम कितने संयमी, सदाचारी, शान्त, मधुर, व्यवस्थित, परिश्रमी,पवित्र, सन्तुलित, शिष्ट, कृतज्ञ एवं उदार हैं, इन सदगुणों का दैनिक जीवन में कितना अधिक प्रयोग करते है, यह देख समझ कर ही किसी को, उसकी आन्तरिक वस्तुस्थिति को जाना जा सकता हैं। जिसक दैनिक जीवन फूहडपन से भरा हुआ हैं वह कितना ही जप, ध्यान, पाठ स्नान करता हो आध्यात्मिक स्तर की कसौटी पर ठूंठ या छूंछ ही समझा जायेगा।
- व्यावहारिक जीवन की उलझनों का समाधान किन्ही नयी कल्पनाओं में ही मिलेगा, उन्हें ढूँढो।
- चरित्र जीवन में शासन करने वाला तत्व हैं और वह प्रतिभा से उच्च है।
- जब शरीर आत्मा के अनुकूल नहीं रह जाता, उसके महत् कार्यों को सम्पन्न करने हेतु अयोग्य एवं असमर्थ हो जाता हैं तो उसे प्रसन्न-प्रशांत भाव से मृत्यु देवता के सुपुर्द कर नए परिवेश में , नए सिरे से जीवन की सम्भावना तलाशी जाती हैं। यही महामृत्यु और नवजन्म का मर्म है।
- जहॉं स्थूल जीवन का स्वार्थ समाप्त होता हैं, वहीं मनुष्यता प्रारम्भ होती है।
- जीवन एक पुण्य हैं और प्रेम उसका मधु।
- जीवन बहुमूल्य हैं, उसे निरर्थक प्रयोजनों के लिये खर्च मत करो।
- जीवन बहुत तथ्य जानने से नहीं, बल्कि सत्य की एक छोटी सी अनुभूतिसे ही बदल जाता है।
- जीवन की मंजिल पर रो-रो कर चलना पौरुष का अपमान है।
- जीवन की हार और जीत को भी खेल समझ कर खेले।
- जीवन की सबसे बडी सफलता सदबुद्धि को प्राप्त करना है।
- जीवन की सभी आवश्यकताओं के लिये परमात्मा पर्याप्त है।
- जीवन का सच्चा सदुपयोग ही जीवन का महामन्त्र है।
- जीवन को नियम के अधीन कर देना आलस्य पर विजय पाना है।
- जीवन को वही समझता हैं जो प्रेम करता हैं और दान करता है।
- जीवन के क्रियाकलाप बाहरी अनुशासन के बजाय आत्मानुशासन द्वारा संचालित होने चाहिये।
- जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं , एक वे जो सोचते हैं, पर करते नहीं। दूसरे वे जो करते हैं पर सोचते नहीं।
- जीवन पद्धति को आध्यात्मिक मोड दिए बिना आत्मा के विकास की सम्भावनाऐं उज्ज्वल नहीं हो सकती। जीवन में आध्यात्मिक गुणों को-उदारता, त्याग, सदिच्छा, सहानुभूति, न्यायपरता, दयाशीलता आदि को जागृत करने का काम शिक्षा द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। शिक्षा मनुष्य को ज्ञानवान ही नहीं शीलवान बनाकर निरामय मानवता के अलंकरणो द्वारा उसके चरित्र का श्रंगार कर देती है। शिक्षा सम्पन्न व्यक्ति ही वह विवेक-शिल्प सिद्ध कर सकता हैं, जिसके द्वारा गुण, कर्म व स्वभाव को वांछित रुप में गढ सकना सम्भव हो सकता है।
- जीवन संवेदना का पर्याय हैं। संवेदना के अंकुरण, प्रस्फुटन एवं अभिवर्द्धन के अनुरुप ही इसका विकास होता है। जीवन विद्या के मर्मज्ञ-नारद।
- जीवन संगीत संयम के साज पर बजता हैं। संयम अतियों से उबरने एवं मध्यम में ठहरने का नाम है।
- जीवन दरद का झरना हैं, जो भी जीते हैं, दरद भोगते हैं, लेकिन हमें दरद भोगते हुए जागना हैं, यही वो जीवन की सत्य साधना हैं। दरद नियति के ऑगन में पडी निहाई है, दरद भगवान के हाथों का हथोडा हैं, भगवान हम पर चोटें देकर, हमें सवॉंरता और गढता हैं, यह बात सुनिश्चित हैं कि आदमी दरद में विकसित होता, खूबसूरत बनता और बढता है।
- जीवन देने के लिये में अपने पिता का ऋणी हूँ , लेकिन अच्छे जीवन के लिये अपने शिक्षक ऋणी हूं।
- जीवन जीने की कला- यदि जीवन में गंतव्य का बोध न हो तो भला गति सही कैसे हो सकती हैं। और यदि कहीं पहुंचना ही न हो तो संतुष्टी कैसे पायी जा सकती हैं। जो जीवन जीने की कला से वंचित हैं समझना चाहिए कि उनके जीवन में न तो दिशा हैं और न कोई एकता है। उनके समस्त अनुभव निरे आणविक रह जाते हैं। उनसे कभी भी उस ऊर्जा का जन्म नहीं हो पाता, जो कि ज्ञान बनकर प्रकट होती हैं। ऐसा व्यक्ति सुख-दु:ख तो जानता है, पर उसे कभी भी आनन्द की अनुभूति नहीं होती।जीवन में यदि आनन्द पाना हैं तो जीवन को फूलो की माला बनाना होगा। जीवन के समस्त अनुभवों को एक लक्ष्य के धागे में कलात्मक रीति से गूंथना होगा। जो जीने की इस कला को नही जानते हैं वे सदा केलिए जिंदगी की सार्थकता एवं कृतार्थता से वंचित रह जाते है।
- जीवन अवसर हैं जिसे गंवा देने पर सब कुछ हाथ से गुम हो जाता है।
- जीवन अन्त तक लडते रहने, प्रभावशाली युद्ध नीति और विजयी परियोजनाओं से असफलता को सफलता में बदल देने का खेल है। असफल लोग तय करले तो संघर्ष का दूसरा मौका सामने होगा।
- जो ईश्वर पर विश्वास रखतते हैं वे निजी जीवन में उदार बनकर जीते है।
- जो सदगुण अपने में नहीं है, उनकी अपने में कल्पना करो और उन्हे अपने जीवन का अभिन्न अंग बना डालो।
- जो उदारता, त्याग, सेवा और परोपकार के लिए कदम नहीं बढा सकता, उसे जीवन की सार्थकता का श्रेय और आनन्द भी नहीं मिल सकता।
- जो वास्तविक मौन को साध लेता हैं , वह भौतिक जीवन में गम्भीर, शान्त, सम्माननीय और वजनदार प्रतीत होता हैं, और आध्यात्मिक जीवन में ईश्वरोन्मुख बनता चला जाता है।
- जो अपनी जीवन शैली को नहीं बदल सकते हैं, उनमें हमारी तप-शक्ति भी विशेष काम नहीं कर पाती। परमपूज्यगुरुदेव।
- जो अपने लिये नहीं ओरो के लिये जीते हैं वे जीवन मुक्त है।
- जुबान की अपेक्षा, जीवन से शिक्षा देना कहीं अधिक प्रभावशाली है।
- नरक और कहीं नहीं, महत्वाकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमने वाले जीवन में है।
- नारी का असली श्रंगार, सादा जीवन उच्च विचार।
- नैतिकता एक गरिमापूर्ण जीवन शैली है।
- नेतृत्व जीवन के क्रिया-कलापों द्वारा किया जाता हैं, बातों से नही।
- अध्यात्म कही जाने वाली जीवन-विद्या एक एसा तथ्य हैं , जिसके उपर मानव-कल्याण की आधार-शिला रखी हुई है। उसे जिस सीमा तक उपेक्षित एवं तिरस्कृत किया जायेगा, उतना ही दु:ख दारिद्रय बढता जाएगा। हमारी सम्पन्नता, समृद्धि, शान्ति, समर्थता एवं प्रगति का एक मात्र अवलम्बन जीवन विद्या ही हैं। यदि हमें सुखी और प्रगतिशील होकर जीना हैं तो स्मरण रखा जाना चाहिये कि दृष्टिकोण में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का समुचित समन्वय नितान्त अनिवार्य हैं। इसकी विमुखता सर्वनाश को सीधा निमन्त्रण देने के बराबर हैं।
- अपनी बुराई अपने इसी जीवन में मरने दो।
- अपने जीवन को अन्तरात्मा द्वारा निर्धारित उच्चतम मानदण्डो पर जीने का प्रयास करे।
- आध्यात्मिक वातावरण श्रेष्ठतर मानव जीवन को गढने वाली प्रयोगशाला है।
- आत्मा का साक्षात्कार ही मनुष्य की सारी सफलताओं का प्राण है। यह तभी संभव है, जब मानव अपने वर्तमान जीवन को श्रेष्ठ, उदार तथा उदात्त भावनाओं से युक्त करने का प्रयास करता है।
- आज का जीवन बीते कल की परछाई है।
- असली आत्मवेत्ता अपने आदर्श प्रस्तुत करके अनुकरण का प्रकाश उत्पन्न करते हैं और अपनी प्रबल मनस्विता द्वारा जन-जीवन में उत्कृष्टता उत्पन्न करके व्यापक विकृतियों का उन्मूलन करने की देवदूतो वाली परम्परा को प्रखर बनाते है।
- अच्छे विचार मनुष्य को सफलता और जीवन देते है।
- अन्त:करण में ईश्वरीय प्रकाश जाग्रत करना ही मनुष्य जीवन का ध्येय है।
- गंभीरतापूर्वक विचार किया जाये तो प्रतीत होगा कि जीवन और जगत् में विद्यमान समस्त दु:खों के कारण तीन हैं - १-अज्ञान २-अशक्ति ३-अभाव। जो इन तीन कारणों को जिस सीमा तक अपने से दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा।
- गीता का पठन-मनन करने वाला प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दे सकता हैं । प्रतिदिन गीता का पाठ, विचार करना शुरु कर दें। गीता के अनुसार अपनी व्यवहार करें, जीवन बनायें तो दु:ख, सन्ताप, हलचल सब मिट जायेगी।
- लोग प्यार करना सीखे। हममें, अपने आप में, अपनी आत्मा और जीवन में , परिवार में, समाज में, कर्तव्य में और ईश्वर में दसों दिशाओं में प्रेम बिखेरना और उसकी लौटती हुयी प्रतिध्वनि का भाव भरा अमृत पीकर धन्य हो जाना, यही जीवन की सफलता है।
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Monday, August 11, 2008
हमारा संग्रह
- सबसे अधिक खराब दिन वे हे , जिस दिन हम एक बार भी हंसी के ठहाके नही लगाते है |
- मनुष्य और कुछ नही , मात्र भटका हुआ देवता है |
- अगर आपने हवा मे महल बनाया है तो कोई ख़राब काम नही किया है, पर अब उसके नीचे नीव बनाये |
- इश्वर साधारण दीखने वाले लोगो को पसंद करता है, इसलिए उसने ऐसे लोग अधिक संख्या मे बनाये |
- सफल नाविक वही है जो अशांत समुद्र मे भी मंजिल तक पहुंचे |
- ईमानदारी से चालाकी भी मात खा जाती है ।
- पानी जितना गहरा होता है, उतना ही शांत होता है |
- अगर आपको किसी आदमी की हंसी निर्मल लगती है तो जान लीजिये वह आदमी भी निश्छल है |
- जब अंधकार बहुत गहन होगा तभी आप सितारे देख पाएंगे |
- जिस दिन सच्चाई को देखकर भी हम बोलना नही चाहते उसी दिन हमारी मोंत की शुरुआत हो जाती है |
- जिसके पास अच्छे मित्र है, उसे दर्पण की जरुरत नही होती |
- वर्तमान की श्रेष्ट कार्यो से ही श्रेष्ट भविष्य बनता है |
- जिसे सीखने की भूख है वह प्रत्येक आदमी और घटना से सीख लेता है |
- श्रद्धा का अर्थ है-श्रेष्टता के प्रति अटूट आस्था |
- श्रद्धा स्वयं मे एक सशक्त मान्यता प्राप्त विज्ञान है |
- निरंतर गरिमापूर्ण चिंतन ही हमारी परिभाषा है |
- इस संसार में प्यार करने लायक दो वस्तुएँ हैं-एक दुःख और दूसरा श्रम । दुख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता ।
- आदर्शों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य के प्रति लगन का जहाँ भी उदय हो रहा है, समझना चाहिए कि वहाँ किसी देवमानव का आविर्भाव हो रहा है ।
- कुचक्र, छद्म और आतंक के बलबूते उपार्जित की गई सफलताएँ जादू के तमाशे में हथेली पर सरसों जमाने जैसे चमत्कार दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं । बिना जड़ का पेड़ कब तक टिकेगा और किस प्रकार फलेगा-फूलेगा
- समर्पण का अर्थ है-पूर्णरूपेण प्रभु को हृदय में स्वीकार करना, उनकी इच्छा, प्रेरणाओं के प्रति सदैव जागरूक रहना और जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे परिणत करते रहना ।
- मनोविकार भले ही छोटे हों या बड़े, यह शत्रु के समान हैं और प्रताड़ना के ही योग्य हैं ।
- सबसे महान् धर्म है, अपनी आत्मा के प्रति सच्चा बनना ।
- सद्व्यवहार में शक्ति है । जो सोचता है कि मैं दूसरों के काम आ सकने के लिए कुछ करूँ, वही आत्मोन्नति का सच्चा पथिक है ।
- जिनका प्रत्येक कर्म भगवान् को, आदर्शों को समर्पित होता है, वही सबसे बड़ा योगी है ।
- कोई भी कठिनाई क्यों न हो, अगर हम सचमुच शान्त रहें तो समाधान मिल जाएगा ।
- सत्संग और प्रवचनों का-स्वाध्याय और सदुपदेशों का तभी कुछ मूल्य है, जब उनके अनुसार कार्य करने की प्रेरणा मिले । अन्यथा यह सब भी कोरी बुद्धिमत्ता मात्र है ।
- सब ने सही जाग्रत् आत्माओं में से जो जीवन्त हों, वे आपत्तिकालीन समय को समझें और व्यामोह के दायरे से निकलकर बाहर आएँ । उन्हीं के बिना प्रगति का रथ रुका पड़ा है ।
- आत्मा को निर्मल बनाकर, इंद्रियों का संयम कर उसे परमात्मा के साथ मिला देने की प्रक्रिया का नाम योग है।
- जैसे कोरे कागज पर ही पत्र लिखे जा सकते हैं, लिखे हुए पर नहीं, उसी प्रकार निर्मल अंतःकरण पर ही योग की शिक्षा और साधना अंकित हो सकती है ।
- योग के दृष्टिकोण से तुम जो करते हो वह नहीं, बल्कि तुम कैसे करते हो, वह बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है ।
- यह आपत्तिकालीन समय है । आपत्ति धर्म का अर्थ है-सामान्य सुख-सुविधाओं की बात ताक पर रख देना और वह करने में जुट जाना जिसके लिए मनुष्य की गरिमा भरी अंतरात्मा पुकारती है ।
- प्रखर और सजीव आध्यात्मिकता वह है, जिसमें अपने आपका निर्माण दुनिया वालों की अँधी भेड़चाल के अनुकरण से नहीं, वरन् स्वतंत्र विवेक के आधार पर कर सकना संभव हो सके ।
- बलिदान वही कर सकता है, जो शुद्ध है, निर्भय है और योग्य है ।
- जिस आदर्श के व्यवहार का प्रभाव न हो, वह फिजूल है और जो व्यवहार आदर्श प्रेरित न हो, वह भयंकर है ।
- भगवान जिसे सच्चे मन से प्यार करते हैं, उसे अग्नि परीक्षाओं में होकर गुजारते हैं ।
- हम अपनी कमियों को पहचानें और इन्हें हटाने और उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियाँ स्थापित करने का उपाय सोचें, इसी में अपना व मानव मात्र का कल्याण है ।
- प्रगति के लिए संघर्ष करो । अनीति को रोकने के लिए संघर्ष करो और इसलिए भी संघर्ष करो कि संघर्ष के कारणों का अन्त हो सके ।
- धर्म की रक्षा और अधर्म का उन्मूलन करना ही अवतार और उसके अनुयायियों का कर्त्तव्य है । इसमें चाहे निजी हानि कितनी ही होती हो, कठिनाई कितनी ही उठानी पड़ती हों ।
- अवतार व्यक्ति के रूप में नहीं, आदर्शवादी प्रवाह के रूप में होते हैं और हर जीवन्त आत्मा को युगधर्म निबाहने के लिए बाधित करते हैं ।
- शरीर और मन की प्रसन्नता के लिए जिसने आत्म-प्रयोजन का बलिदान कर दिया, उससे बढ़कर अभागा एवं दुर्बुद्धि और कौन हो सकता है ?
- आचारनिष्ठ उपदेशक ही परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं । अनधिकारी धर्मोपदेशक खोटे सिक्के की तरह मात्र विक्षोभ और अविश्वास ही भड़काते हैं ।
- इन दिनों जाग्रत् आत्मा मूक दर्शक बनकर न रहे । बिना किसी के समर्थन, विरोध की परवाह किए आत्म-प्रेरणा के सहारे स्वयंमेव अपनी दिशाधारा का निर्माण-निर्धारण करें ।
- जो भौतिक महत्त्वाकांक्षियों की बेतरह कटौती करते हुए समय की पुकार पूरी करने के लिए बढ़े-चढ़े अनुदान प्रस्तुत करते और जिसमें महान् परम्परा छोड़ जाने की ललक उफनती रहे, यही है-प्रज्ञापुत्र शब्द का अर्थ ।
- चरित्रवान् व्यक्ति ही किसी राष्ट्र की वास्तविक सम्पदा है ।
- व्यक्तिगत स्वार्थों का उत्सर्ग सामाजिक प्रगति के लिए करने की परम्परा जब तक प्रचलित न होगी, तब तक कोई राष्ट्र सच्चे अर्थों में सार्मथ्यवान् नहीं बन सकता है ।
- युग निर्माण योजना का लक्ष्य है-शुचिता, पवित्रता, सच्चरित्रता, समता, उदारता, सहकारिता उत्पन्न करना
- भुजाएँ साक्षात् हनुमान हैं और मस्तिष्क गणेश, इनके निरन्तर साथ रहते हुए किसी को दरिद्र रहने की आवश्यकता नहीं ।
- मनुष्य दुःखी, निराशा, चिंतित, उदिग्न बैठा रहता हो तो समझना चाहिए सही सोचने की विधि से अपरिचित होने का ही यह परिणाम है ।
- धर्म अंतःकरण को प्रभावित और प्रशासित करता है, उसमें उत्कृष्टता अपनाने, आदर्शों को कार्यान्वित करने की उमंग उत्पन्न करता है ।
- चिंतन एवं घृणित कर्तृत्व हमारी गौरव गरिमा पर लगा हुआ कलंक है ।
- आत्मा का परिष्कृत रूप ही परमात्मा है ।
- हम कोई ऐसा काम न करें, जिसमें अपनी अंतरात्मा ही अपने को धिक्कारे ।
- अपनी दुष्टताएँ दूसरों से छिपाकर रखी जा सकती हैं, पर अपने आप से कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता ।
- किसी महान् उद्देश्य की ओर न चलना उतनी लज्जा की बात नहीं होती, जितनी कि चलने के बाद कठिनाइयों के भय से पीछे हट जाना ।
- महानता का गुण न तो किसी के लिए सुरक्षित है और न प्रतिबंधित । जो चाहे अपनी शुभेच्छाओं से उसे प्राप्त कर सकता है ।
- सच्ची लगन तथा निर्मल उद्देश्य से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जाता ।
- मनुष्य जन्म सरल है, पर मनुष्यता कठिन प्रयत्न करके कमानी पड़ती है ।
- ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।
- किसी सदुद्देश्य के लिए जीवन भर कठिनाइयों से जूझते रहना ही महापुरुष होना है ।
- अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हो ।
- चरित्र का अर्थ है- अपने महान् मानवीय उत्तरदायित्वों का महत्त्व समझना और उसका हर कीमत पर निर्वाह करना ।
- मनुष्य एक भटका हुआ देवता है । सही दिशा पर चल सके, तो उससे बढ़कर श्रेष्ठ और कोई नहीं ।
- जो बीत गया सो गया, जो आने वाला है वह अज्ञात है! लेकिन वर्तमान तो हमारे हाथ में है ।
- युग परिवर्तन की यह बेला आपको सपरिवार मंगलमय हो | शिव की शक्ति, मीरा की भक्ति, गणेश की सिद्धि, चाणक्य की बुद्धि, शारदा का ज्ञान, कर्ण का दान,राम की मर्यादा, भीष्म का वादा, हरिश्चंद की सत्यता, लक्ष्मी की अनुकम्पा एवम् कुबेर की सम्पन्नता प्राप्त हो यही हमारी शुभकामना है |
- विचार शक्ति इस विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है | उसी ने मनुष्य के द्वारा इस उबड़-खाबड़ दुनिया को चित्रशाला जैसी सुसज्जित और प्रयोगशाला जैसी सुनियोजित बनाया है | विनाश करना होगा तो भी वही करेगी | दीन, हीन और दयनीय स्थिति मे पड़े रहने देने की जिम्मेदारी भी उसी की है | उत्थान-पतन की अधिष्ठात्री भी तो वही है | वस्तुस्तिथि को समझते हुऐ इन दिनों करने योग्य एक ही काम है " जन मानस का परिष्कार " | इस को विचार क्रांति का नाम दिया गया है | इसी की सफलता-असफलता पर विश्व के मनुष्य का उत्थान-पतन पूरी तरह निर्भर है | प्रमुखता और प्राथमिकता इसी की मिलनी चाहिए | विश्वात्मा की यही मांग है | दैवी शक्तिया इसी को संपन्न करने के लिए उद्यत है | प्रयोजन की पूर्ति के लिए जो कदम बढायेंगे वे पाएंगे की हवा अनुकूल चल रही है | ऐसी अनुकूल जिसमे अभीष्ट की सफलता अत्यन्त सरल संभव होती दीख पड़े |
- नहीं संगठित सज्जन लोग । रहे इसी से संकट भोग ॥
- इस बात पर संदेह नहीं करना चाहिये कि विचारवान और उत्साही व्यक्तियों का एक छोटा सा समूह इस संसार को बदल सकता है । वास्तव मे इस संसार को इसने (छोटे से समूह) ही बदला है ।
- जिस काम को करने में डर लगता है उसको करने का नाम ही साहस है ।
- मुट्ठीभर संकल्पवान लोग, जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं। - महात्मा गांधी
- अभय-दान सबसे बडा दान है ।
- भय से ही दुख आते हैं, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयां उत्पन्न होती हैं । — विवेकानंद
- गलती तो हर मनुष्य कर सकता है , पर केवल मूर्ख ही उस पर दृढ बने रहते हैं ।
- अपनी गलती स्वीकार कर लेने में लज्जा की कोई बात नहीं है । इससे दूसरे शब्दों में यही प्रमाणित होता है कि कल की अपेक्षा आज आप अधिक समझदार हैं ।
- गलती करने में कोई गलती नहीं है ।
- गलती करने से डरना सबसे बडी गलती है । — एल्बर्ट हब्बार्ड
- यदि शांति पाना चाहते हो , तो लोकप्रियता से बचो।
- सही प्रश्न पूछना मेधावी बनने का मार्ग है ।
- जो प्रश्न पूछता है वह पाँच मिनट के लिये मूर्ख बनता है लेकिन जो नही पूछता वह जीवन भर मूर्ख बना रहता है ।
- मैं छः ईमानदार सेवक अपने पास रखता हूँ | इन्होंने मुझे वह हर चीज़ सिखाया है जो मैं जानता हूँ | इनके नाम हैं – क्या, क्यों, कब, कैसे, कहाँ और कौन |
- यह कैसा समय है? मेरे कौन मित्र हैं? यह कैसा स्थान है। इससे क्या लाभ है और क्या हानि? मैं कैसा हूं। ये बातें बार-बार सोचें (जब कोई काम हाथ में लें)। - नीतसार
- मैं यह जानने के लिये लिखता हूँ कि मैं सोचता क्या हूँ ।
- मैने सीखा है कि किसी प्रोजेक्ट की योजना बनाते समय छोटी से छोटी पेन्सिल भी बडी से बडी याददास्त से भी बडी होती है ।
- पहले हर अच्छी बात का मज़ाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है। - स्वामी विवेकानंद
- नेतृत्व का रहस्य है , आगे-आगे सोचने की कला ।
- हमारी शक्ति हमारे निर्णय करने की क्षमता में निहित है ।
- निर्णय लेने से उर्जा उत्पन्न होती है , अनिर्णय से थकान ।
- कहकर बताने के बहुत से प्रयत्न अत्यधिक कह देने के कारण व्यर्थ चले जाते हैं ।
- अधिक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के सफल होने की सम्भावना ज्यादा होती है ।
- ग्रन्थ , पन्थ हो अथवा व्यक्ति , नहीं किसी की अंधी भक्ति । — श्रीराम शर्मा , आचार्य
- मौन और एकान्त,आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं । — बिनोवा भावे
- मनुष्य की वास्तविक पूँजी धन नहीं , विचार हैं । — श्रीराम शर्मा , आचार्य
- मनःस्थिति बदले , तब परिस्थिति बदले । - पं श्री राम शर्मा आचार्य
- आचरण के बिना ज्ञान केवल भार होता है ।
- हजारों मील की यात्रा भी प्रथम चरण से ही आरम्भ होती है ।
- भलाई का एक छोटा सा काम हजारों प्रार्थनाओं से बढकर है ।
- संसार का सबसे बडा दिवालिया वह है जिसने उत्साह खो दिया ।
- विद्यार्थी के पाँच लक्षण होते हैं : कौवे जैसी दृष्टि , बकुले जैसा ध्यान , कुत्ते जैसी निद्रा , अल्पहारी और गृहत्यागी ।
- अपनी अज्ञानता का अहसास होना ज्ञान की दिशा में एक बहुत बडा कदम है ।
- ज्ञान एक खजाना है , लेकिन अभ्यास इसकी चाभी है।
- प्रज्ञा-युग के चार आधार होंगे - समझदारी , इमानदारी , जिम्मेदारी और बहादुरी । — श्रीराम शर्मा , आचार्य
- जिसने ज्ञान को आचरण में उतार लिया , उसने ईश्वर को मूर्तिमान कर लिया |
- बच्चों को शिक्षा के साथ यह भी सिखाया जाना चाहिए कि वह मात्र एक व्यक्ति नहीं है, संपूर्ण राष्ट्र की थाती हैं। उससे कुछ भी गलत हो जाएगा तो उसकी और उसके परिवार की ही नहीं बल्कि पूरे समाज और पूरे देश की दुनिया में बदनामी होगी। बचपन से उसे यह सिखाने से उसके मन में यह भावना पैदा होगी कि वह कुछ ऐसा करे जिससे कि देश का नाम रोशन हो। योग-शिक्षा इस मार्ग पर बच्चे को ले जाने में सहायक है। - स्वामी रामदेव
- सबसे अधिक ज्ञानी वही है जो अपनी कमियों को समझकर उनका सुधार कर सकता हो।
- महान पुरुष की पहली पहचान उसकी विनम्रता है।
- विवेक की सबसे प्रत्यक्ष पहचान , सतत प्रसन्नता है ।
- ज्ञान भूत है , विवेक भविष्य ।
- अरूणोदय के पूर्व सदैव घनघोर अंधकार होता है।
- निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है । — प्रेमचन्द
- खुदा एक दरवाजा बन्द करने से पहले दूसरा खोल देता है, उसे प्रयत्न कर देखो | – शेख सादी
- दो आदमी एक ही वक् जेल की सलाखों से बाहर देखते हैं, एक को कीचड़ दिखायी देता है और दूसरे को तारे । — फ्रेडरिक लेंगब्रीज
- हर अच्छा काम पहले असंभव नजर आता है।
- कम्प्यूटर को प्रोग्राम करने के लिये संस्कृत सबसे सुविधाजनक भाषा है । — फोर्ब्स पत्रिका ( जुलाई , १९८७ )
- चिन्ता चिता के पास ले जाती है ।
- क्रोध सदैव मूर्खता से प्रारंभ होता है और पश्चाताप पर समाप्त।
- यदि आवश्यकता आविष्कार की जननी ( माता ) है , तो असन्तोष विकास का जनक ( पिता ) है ।
- क्रोध , एक कमजोर आदमी द्वारा शक्ति की नकल है ।
- विवेक की सबसे प्रत्यक्ष पहचान सतत प्रसन्नता है ।
- धीरज प्रतिभा का आवश्यक अंग है ।
- धर्म का उद्देश्य मानव को पथभ्रष्ट होने से बचाना है । — श्रीराम शर्मा , आचार्य
- कथनी करनी भिन्न जहाँ हैं , धर्म नहीं पाखण्ड वहाँ है ॥ — श्रीराम शर्मा , आचार्य
- उसी धर्म का अब उत्थान , जिसका सहयोगी विज्ञान ॥ — श्रीराम शर्मा , आचार्य
- सत्य को कह देना ही मेरा मज़ाक करने का तरीका है। संसार में यह सब से विचित्र मज़ाक है। - जार्ज बर्नार्ड शॉ
- झूठ का कभी पीछा मत करो । उसे अकेला छोड़ दो। वह अपनी मौत खुद मर जायेगा ।
- ‘अहिंसा’ भय का नाम भी नहीं जानती। - महात्मा गांधी
- घमंड करना जाहिलों का काम है। - शेख सादी
- बुद्धिमान किसी का उपहास नहीं करते हैं।
- नम्रता सारे गुणों का दृढ़ स्तम्भ है।
- दूसरों का जो आचरण तुम्हें पसंद नहीं , वैसा आचरण दूसरों के प्रति न करो।
- गहरी नदी का जल प्रवाह शांत व गंभीर होता है | – शेक्सपीयर
- संयम और श्रम मानव के दो सर्वोत्तम चिकित्सक हैं । श्रम से भूख तेज होती है और संयम अतिभोग को रोकता है । — रूसो
- महान कार्य महान त्याग से ही सम्पन्न होते हैं । — स्वामी विवेकानन्द
- समाज के हित में अपना हित है । — श्रीराम शर्मा , आचार्य
- सदाचार , शिष्टाचार से अधिक महत्वपूर्ण है ।
- दुनिया में सिर्फ दो सम्पूर्ण व्यक्ति हैं – एक मर चुका है, दूसरा अभी पैदा नहीं हुआ है।
- हम जानते हैं कि हम क्या हैं, पर ये नहीं जानते कि हम क्या बन सकते हैं।
- मेहनत करने से दरिद्रता नहीं रहती, धर्म करने से पाप नहीं रहता, मौन रहने से कलह नहीं होता और जागते रहने से भय नहीं होता | –चाणक्य
- आपत्तियां मनुष्यता की कसौटी हैं । इन पर खरा उतरे बिना कोई भी व्यक्ति सफल नहीं हो सकता । –पं रामप्रताप त्रिपाठी
- कष्ट और विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ गुण हैं। जो साहस के साथ उनका सामना करते हैं, वे विजयी होते हैं । –लोकमान्य तिलक
- प्रकृति, समय और धैर्य ये तीन हर दर्द की दवा हैं ।
- कांटों को मुरझाने का डर नहीं सताता।
- आंख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता । –चाणक्य
- जो दीपक को अपने पीछे रखते हैं वे अपने मार्ग में अपनी ही छाया डालते हैं ।
- महान ध्येय ( लक्ष्य ) महान मस्तिष्क की जननी है ।
- इच्छा ही सब दुःखों का मूल है | -– बुद्ध
- किसी बालक की क्षमताओं को नष्ट करना हो तो उसे रटने में लगा दो । — बिनोवा भावे
- हिन्दुस्तान का आदमी बैल तो पाना चाहता है लेकिन गाय की सेवा करना नहीं चाहता। वह उसे धार्मिक दृष्टि से पूजन का स्वांग रचता है लेकिन दूध के लिये तो भैंस की ही कद्र करता है। हिन्दुस्तान के लोग चाहते हैं कि उनकी माता तो रहे भैंस और पिता हो बैल। योजना तो ठीक है लेकिन वह भगवान को मंजूर नहीं है। - विनोबा
- बकरियों की लड़ाई, मुनि के श्राद्ध, प्रातःकाल की घनघटा तथा पति-पत्नी के बीच कलह में प्रदर्शन अधिक और वास्तविकता कम होती है। - नीतिशास्त्र
- जो व्यक्ति सोने का बहाना कर रहा है उसे आप उठा नहीं सकते |
- पुस्तक प्रेमी सबसे धनवान व सुखी होता है।
- आपका आज का पुरुषार्थ आपका कल का भाग्य है |
- प्रत्येक मनुष्य में तीन चरित्र होता है। एक जो वह दिखाता है, दूसरा जो उसके पास होता है, तीसरी जो वह सोचता है कि उसके पास है |
- जिस राष्ट्र में चरित्रशीलता नहीं है उसमें कोई योजना काम नहीं कर सकती । — विनोबा
- सत्यमेव जयते । ( सत्य ही विजयी होता है )
- श्रेष्ठ आचरण का जनक परिपूर्ण उदासीनता ही हो सकती है |
- स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है ।
- बीस वर्ष की आयु में व्यक्ति का जो चेहरा रहता है, वह प्रकृति की देन है, तीस वर्ष की आयु का चेहरा जिंदगी के उतार-चढ़ाव की देन है लेकिन पचास वर्ष की आयु का चेहरा व्यक्ति की अपनी कमाई है। - अष्टावक्र
- बिना सहकार , नहीं उद्धार ।
- मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। — महात्मा गाँधी
- बुराई के अवसर दिन में सौ बार आते हैं तो भलाई के साल में एकाध बार।
- खेल के अंत में राजा और पिद्दा एक ही बक्से में रखे जाते हैं |
- जो दूसरों से घृणा करता है वह स्वयं पतित होता है – विवेकानन्द
- प्यार के अभाव में ही लोग भटकते हैं और भटके हुए लोग प्यार से ही सीधे रास्ते पर लाए जा सकते हैं। ईसा मसीह
- अच्छी योजना बनाना बुद्धिमानी का काम है पर उसको ठीक से पूरा करना धैर्य और परिश्रम का ।
- विश्वास वह पक्षी है जो प्रभात के पूर्व अंधकार में ही प्रकाश का अनुभव करता है और गाने लगता है । –रवींद्रनाथ ठाकुर
- दरिद्र व्यक्ति कुछ वस्तुएं चाहता है, विलासी बहुत सी और लालची सभी वस्तुएं चाहता है।
- चंद्रमा अपना प्रकाश संपूर्ण आकाश में फैलाता है परंतु अपना कलंक अपने ही पास रखता है।
- लगन और योग्यता एक साथ मिलें तो निश्चय ही एक अद्वितीय रचना का जन्म होता है ।
- प्रत्येक बालक यह संदेश लेकर आता है कि ईश्वर अभी मनुष्यों से निराश नहीं हुआ है। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर
- अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्हें सींच-सींच कर महाप्राण शक्तियां बनाते हैं।
- तूफान जितना ही बडा होगा , उतना ही जल्दी खत्म भी हो जायेगा ।
- लडखडाने के फलस्वरूप आप गिरने से बच जाते हैं ।
- जिस काम की तुम कल्पना करते हो उसमें जुट जाओ। साहस में प्रतिभा, शक्ति और जादू है। साहस से काम शुरु करो पूरा अवश्य होगा।
- मनुष्य मन की शक्तियों के बादशाह हैं। संसार की समस्त शक्तियाँ उनके सामने नतमस्तक हैं।
- सबसे उत्तम विजय प्रेम की है। जो सदैव के लिए विजेताओं का हृदय बाँध लेती है सम्राट अशोक
- नेकी से विमुख हो बदी करना निस्संदेह बुरा है। मगर सामने मुस्काना और पीछे चुगली करना और भी बुरा है।
- अधर्म की सेना का सेनापति झूठ है। जहाँ झूठ पहुँच जाता है वहाँ अधर्म-राज्य की विजय-दुंदुभी अवश्य बजती है।
- जैसे जीने के लिए मृत्यु का अस्वीकरण ज़रूरी है वैसे ही सृजनशील बने रहने के लिए प्रतिष्ठा का अस्वीकरण ज़रूरी है।
- कर्म, ज्ञान और भक्ति- ये तीनों जहाँ मिलते हैं वहीं सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ जन्म लेता है।
- उत्तम पुरुषों की संपत्ति का मुख्य प्रयोजन यही है कि औरों की विपत्ति का नाश हो। रहीम
- विद्वत्ता युवकों को संयमी बनाती है। यह बुढ़ापे का सहारा है, निर्धनता में धन है, और धनवानों के लिए आभूषण है।
- मनस्वी पुरुष पर्वत के समान ऊँचे और समुद्र के समान गंभीर होते हैं। उनका पार पाना कठिन है।
- विश्व के निर्माण में जिसने सबसे अधिक संघर्ष किया है और सबसे अधिक कष्ट उठाए हैं वह माँ है।
- जब पैसा बोलता है तब सत्य मौन रहता है। कहावत
- उदय होते समय सूर्य लाल होता है और अस्त होते समय भी। इसी प्रकार संपत्ति और विपत्ति के समय महान पुरुषों में एकरूपता होती है।
- वृक्ष अपने सिर पर गरमी सहता है पर अपनी छाया में दूसरों का ताप दूर करता है।
- चापलूसी का ज़हरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुँचा सकता जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझ कर पी न जाएँ।
- संपदा को जोड़-जोड़ कर रखने वाले को भला क्या पता कि दान में कितनी मिठास है आचार्य श्रीराम शर्मा
- केवल अंग्रेज़ी सीखने में जितना श्रम करना पड़ता है उतने श्रम में भारत की सभी भाषाएँ सीखी जा सकती हैं। विनोबा
- धैर्यवान मनुष्य आत्मविश्वास की नौका पर सवार होकर आपत्ति की नदियों को सफलतापूर्वक पार कर जाते हैं।
- केवल प्रकाश का अभाव ही अंधकार नहीं, प्रकाश की अति भी मनुष्य की आँखों के लिए अंधकार है।
- कलियुग में रहना है या सतयुग में यह तुम स्वयं चुनो, तुम्हारा युग तुम्हारे पास है।
- श्रद्धा और विश्वास ऐसी जड़ी बूटियाँ हैं कि जो एक बार घोल कर पी लेता है वह चाहने पर मृत्यु को भी पीछे धकेल देता है।
- आप छोटों पर दया नहीं करते तो आपको बड़ों से दया माँगने का कोई अधिकार नहीं ।
- मन्दिर तोडो, मस्जिद तोडो, इसमें क्या मुजायका हैं। दिल मत तोडो यार किसी का, यह घर खास खुदा का है।
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