- समय बर्बाद मत करो क्योंकी जीवन उससे ही बना है |
- निराशा से जीवन के बहुमूल्य तत्व नष्ट हो जाते है |
- जीवन के प्रकाशवान् क्षण वे हैं, जो सत्कर्म करते हुए बीते ।
- जीवन का आनन्द गौरव के साथ, सम्मान के साथ और स्वाभिमान के साथ जीने में है ।
- जीवन साधना का अर्थ है- अपने समय, श्रम और साधनों का कण-कण उपयोगी दिशा में नियोजित किये रहना ।
- उत्कृष्ट जीवन का स्वरूप है-दूसरों के प्रति नम्र और अपने प्रति कठोर होना ।
- वही जीवित है, जिसका मस्तिष्क ठण्डा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है ।
- जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं । पहले वे जो सोचते हैं पर करते नहीं , दूसरे वे जो करते हैं पर सोचते नहीं ।
- जीवन में हमारी सबसे बडी जरूरत कोई ऐसा व्यक्ति है , जो हमें वह कार्य करने के योग्य बना दे , जिसे हम कर सकते हैं ।
- व्यावहारिक जीवन की उलझनों का समाधान किन्हीं नयी कल्पनाओं में मिलेगा , उन्हें ढूढो ।
- सम्पूर्ण जीवन ही एक प्रयोग है । जितने प्रयोग करोगे उतना ही अच्छा है ।
- हर दिन नया जन्म समझें , उसका सदुपयोग करें ।
- धर्म, सत्य और तप-यही जीवन की सार संपत्ति है।
- यदि कभी मालूम करना हो कि व्यक्ति में आध्यात्मिक जीवन कितना विकसित हुआ हैं तो यह परखो कि उसकी संकल्प शक्ति कितनी विकसित हुई है।
- यदि हम अपना जीवन श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने विचारों , संकल्पो को श्रेष्ठ बनाना आवश्यक हैं। यही बीज हैं जिससे कर्म रुपी वृक्ष निकलता है।
- यदि जीवन में सुखी रहना चाहते हों तो हमेशा भलाई करो।
- यदि आस्तिकता कभी जीवन में फलित होगी तो व्यक्ति कर्तव्य पालन को सबसे पहले महत्व देगा।
- यज्ञ हमारा तभी सफल, जब जन जीवन बने बिमल।
- ऊंचे विचार लाने के लिये सादा जीवन आवश्यक है।
- ईश्वर से पाना और प्राणियों में बॉटना, इसी में सच्ची सम्पन्नता, समर्थता और जीवन की सच्ची सार्थकता है।
- बूंद-बूंद से सागर बनता हैं और क्षण-क्षण से जीवन। बूंद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है और क्षण को जो पा ले, वह जीवन को पा लेता हैं। क्षण में शाश्वत की पहचान ही जीवन का आध्यात्मिक रहस्य है।
- बगीचे में फूल खिलते हैं, वातावरण सुगन्धित हो जाता हैं। मन में उत्तम विचार खिलते है, जीवन सुगन्धित हो जाता हैं। यही सुगन्धित जीवन हमारा लक्ष्य हो।
- कर्म, भक्ति एवं ज्ञान :- भक्ति एवं ज्ञान से विमुख कर्म केवल महत्वाकांक्षा की पूर्ति का साधन व जीवन में भटकन का पर्याय बन कर रह जाता हैं। इसी तरह कर्म एवं ज्ञान से विमुख भक्ति कोरी भावुकता बन जाती हैं और यदि ज्ञान, कर्म एवं भक्ति से विमुख हो, तो कोरी विचार तरंगे ही पल्ले पडती है। जो मात्र दिवास्वपनो की सृष्टि करती रहती है।
- कर्मकाण्ड और पूजा पाठ की श्रेणी में साधक तभी आता हैं, जब उसका जीवन क्रम उत्कृष्टता की दिशा में क्रमबद्ध रीति से अग्रसर हो रहा हो और क्रिया कलाप में उस रीति-नीति का समावेश हो जो आत्मवादी के साथ आवश्यक रुप से जुडे रहते है।
- कहा जाता हैं कि जीवन में दु:खो से संघर्ष करने के लिये साहस चाहिये। वास्तविकता यह हैं कि साहसी व्यक्ति तक दु:ख पहुंचता ही नहीं।
- कायर अपने जीवन काल में ही अनेक बार मरते हैं, वीर लोग केवल एक बार ही मरते है।
- बोध की अवस्था में जिन्दगी बोझ के बजाय शिक्षालय बन जाती हैं। हर कहीं से ज्ञान का अंकुरण होता है। जो बोध में जीता है, वह सुख के क्षणों का सदुपयोग करता हैं। उसे दु:ख के क्षणों का भी महत्तवपूर्ण उपयोग करना आता हैं। सुख के क्षणों को वह योग बना लेता है तो दु:ख के क्षण उसके लिए तप बन जाते है। प्रत्येक अवस्था में उसे जीवन की सार्थकता की समझ होती है।
- ब्राह्मणत्व एक साधना हैं मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान हैं।इस साधना की ओर उन्मुख होने वाले क्षत्रिय विश्वामित्र और शुद्र ऐतरेय ब्राह्मण हो जाते हैं। साधना से विमुख होने पर ब्राह्मण कुमार अजामिल और धुंधकारी शुद्र हो गये। सही तो हैं जन्म से कोई कब ब्राह्मण हुआ हैं ? ब्राह्मण वह जो समाज से कम से कम लेकर उसे अधिकतम दे। स्वयं के तप, विचार और आदर्श जीवन के द्वारा अनेको को सुपथ पर चलना सिखाये।
- कल्पना मानवीय चेतना की दिव्य क्षमता हैं। यही वह शक्ति हैं, जिसके प्रयोग से मनुष्य देह-बन्धन में रहते हुए भी असीम और विराट तत्त्व से संपर्क कर पाता है। इसी के उपयोग से उसके जीवन में नई अनुभूतियों के द्वार खुलते है, चेतना में नवीन आयाम उदघाटित होते है। इन्हीं से नवसृजन के अंकुर फूटते है। कलाओं की सृष्टि होती है, अनुसंधान की आधारशिला रखी जाती है। उपलब्धियॉं लौकिक हो या अलौकिक, इनके पथ पर पहला पग कल्पनाओं के बलबूते ही रखा जाता है।
- क्लेश का कारण इच्छा और परिस्थिति के बीच प्रतिकूलता को होना ही है। विवेकवान लोग इन दोनो में से किसी को अपनाकर उस संघर्ष को टाल देता हैं और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है।
- मृत्यु एक महोत्सव हैं। इस तथ्य को वही समझ पाता हैं, जिसने अपने सम्पूर्ण जीवन त्याग, सेवा, आदर्श, सचाई और सदचिन्तन को अपनाया-आत्मसात किया।
- महानता के दो आधार, सादा जीवन उच्च विचार।
- मानव जीवन का मन्थन करने पर जो अमृत निकलता हैं, उसका नाम आत्म गौरव है।
- मानव जीवन का परम पुरुषार्थ हैं-अपनी निकृष्ट मानसिकता से त्राण पायें।
- मानव जीवन मे आधी गलतियॉ तो केवल मात्र इसलिये हो जाती हैं कि जहॉं हमें विचार से काम लेना चाहिये वहॉं हम भावना से काम लेते हैं और जहॉ भावनाओं की आवश्यकता रहती हैं वहॉं विचारों को अपनाते हैं।
- मनुष्य बुद्धिमानी का गर्व करता हैं, पर किस काम की वह बुद्धिमानी, जिससे जीवन की साधारण कला, हंस खेल कर जीने की प्रक्रिया भी हाथ न आये।
- मनुष्य चौरासी लाख योनियों में घूमते-घूमते उन सारे-के-सारे प्राणियों के कुसंस्कार अपने भीतर जमा कररके लाया हैं, जो मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक नहीं हैं, वरद् हानिकारक है। तो भी वे स्वभाव के अंग बन गये हैं और हम मनुष्य होते हुए भी -पशु-संस्कारो से प्रेरित रहते हैं और पशु प्रवृत्तियों को बहुधा अपने जीवन में कार्यान्वित करते रहते है। इस अनगढपन को ठीक कर लेना, सुगढपन का अपने भीतर से विकास कर लेना, कुसंस्कारो को, जो पिछली योनियों के कारण हमारे भीतर जमे हुए हैं, उनको निरस्त कर देना और अपना स्वभाव इस तरह का बना लेना, जिसकों हम मानवोचित कर सकें- साधना है।
- मनुष्य जीवन का लक्ष्य ईश सत्ता में प्रवेश करना है।
- मनुष्य जीवन के समय को अमूल्य और क्षणिक समझ कर उत्तम से उत्तम काम में व्यतीत करना चाहिये। एक क्षण भी व्यर्थ नहीं बिताना चाहिये।
- मनुष्य जीवन पाकर जिसने ज्ञान की कतिपय बूंदे इकट्ठी न की , उसने मानो इस रतन को मिट्टी के मोल खो दिया।
- किसी सद्उद्धेश्य के लिये जीवन भर कठिनाइयों से जूझते रहना ही महापुरुष होना है।
- किसी आदर्श के लिये हंसते-हंसते जीवन का उत्सर्ग कर देना सबसे बडी बहादुरी है।
- किवदंतिया वे ही बनते हैं, जो जीवन के प्रत्येक क्षण से सीखने की क्षमता रखते है।
- शिक्षक वह हैं, जो छात्रों को सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि जीवन के संघर्ष में सफल होने का गुरुमन्त्र और रास्ता भी बताता है।
- विषमताओं का यदि समुचित सदुपयोग किया जा सके तो जीवात्मा पर चढें हुए जन्म-जन्मांतर के कषाय-कल्मष धुलते है। प्रवृत्तियों का परिष्कार होता हैं - आंतरिक शक्तियों में निखार आता हैं । इसलिए जीवन में विषम क्षणों के उपस्थित होने पर इनसे घबराने की बजाय इनके सदुपयोग की कला सीखनी चाहिए।
- विश्वास जीवन हैं, संशय मौत है।
- विचारों में तो सभी आदर्शवादी होते हैं। योग्य-अयोग्य का ज्ञान या पुण्य-पाप की अनुभूति तो मूर्ख और पापी को भी होती हैं, किन्तु व्यावहारिक जीवन में हम उसे भूल जाते हैं। धर्म को जानते हुऐ भी उसमें प्रवृत्त नहीं होते और अधर्म को जानते हुए भी उससे निवृत्त नहीं होते।
- चिन्ताओं से दूर भाग्यशाली ही इस जीवन का आनन्द ले सकता है।
- चिन्तन बहुतों ने सिखाया हैं, पर ऐसे बहुत कम मिले, जो चिन्तन को जीवन में उतारना सिखा पाते।
- जिस व्यक्ति को समय का मूल्य नहीं मालूम, वह जीवन में क्या कर सकता है।
- जिस तरह प्रकाश को जानने के लिये नेत्रों की आवश्यकता हैं, उसी तरह तत्व ज्ञान प्राप्त करने के लिये ज्ञान और विवेक की आवश्यकता हैं, जिसके बिना हमारा जीवन व्यर्थ है।
- जिसकी दिनचर्या अस्त-व्यस्त हैं वह अपने जीवन में भी भूला-भटका रहता है।
- जिसने आज दिया वही कल देगा। जिसने आज दिया हैं , वह कल भी देगा। वह कल भी देगा- वह कौन है ? परमात्मा ? नहीं, तुम्हारा पुण्य है। इस संसार में जो भी सुख-सुविधा मिलती है वह सब पुण्य से ही मिलती है। पुण्य ही दिलाता हैं और पुण्य ही जिलाता हैं संसार में अगर कोई मॉं-बाप हैं तो पुण्य ही हैं। वही हमारा पालनहार है। इसलिए अपने जीवन में पुण्य का संचय करते रहो। जहॉ से भी मिले पुण्य लूटते रहो। पुण्य का खजाना खाली न होने पाये। इस बात का विशेष ख्याल रखना। पूरे दिन में कम से कम दो पुण्य काम जरुर करो। पाप तो दिनभर में सेकडो हो जाते हैं, पर पूरे दिन में कम से कम दो पुण्य जरुर करो। इससे हमारा ना सिर्फ यह जीवन सम्भलेगा अपितु इसके बाद का जीवन भी सम्भल जायेगा। यह जीवन का महत्त्वपूर्ण सूत्र हैं जिसे जीकर हम जीवन को सार्थकता दे सकते है।
- निरुद्धेश्य जीवन काट डालना लज्जा एवं कलंक भरी बात है।
- निस्वार्थ सेवा से उपजा सुख जीवन की भीषणतम कठिनाईयों के समय भी आनन्द की अनुभूति प्रदान करता है।
- निर्दोषता जीवन का आहार हैं और दोष जीवन का विकार हैं आहार लो, विकार त्याग दो। निर्दोषता ही पोषण हैं, वही जीवन है।
- हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को जीवन में उतारे।
- हम प्यार करना सीखें, हममें, अपने आप में, अपनी आत्मा और जीवन में, परिवार में, समाज में और ईश्वर में, दसों-दिशाओं में प्रेम बिखेरना और उसकी लौटती प्रतिध्वनि का भाव-भरा अमृत पीकर धन्य हो जाना, यही जीवन की सफलता हैं।
- हमारा परिधान सभी को इस बात की सूचना दे सके कि हम राजनीतिक रुप से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रुप से भी स्वतंत्र हैं और हमारी भारतीय जीवन मूल्यों में आस्था है।
- हमें नियमित रुप से सद्ग्रन्थो का अवलोकन करना चाहिये, उत्तम पुस्तको का स्वाध्याय जीवन का आवश्यक कर्तव्य बना लेना चाहिये।
- भय जीवन का सबसे बडा शत्रु है।
- भविष्य में जीवन खोजने वाले अपने वर्तमान से हमेशा असंतुष्ठ, असंतृप्त बने रहते है।
- भारत एक आध्यात्मिक राष्ट्र हैं। यहॉं के राष्ट्रीय जीवन की समस्याओं का समाधान , भावी चुनौतियों का उत्तर आध्यात्मिक आंदोलनो से ही निकलेगा। आध्यात्मिक जागरण भारत में राष्ट्रीय जागरण की पहली और अनिवार्य शर्त हैं। भारतीय समाज का सामुहिक मन आध्यात्मिकता में रचता-बसता है।
- पडित/संत-जो शास्त्रों के पीछे दौडता हैं, वह पंडित है। और जो सत्य के पीछे दौडता है, वह संत है। पंडित शास्त्रो के पीछे दौडता है। जबकि संत के पीछे शास्त्र दौडतें हैं। शास्त्र पढकर जो बोले वह पंडित और सत्य पाकर जो बोले वह संत हैं। पंडित जीभ से बोलता है, संत जीवन से बोलता हैं, जिसका जीवन बोलने लगे, वह जीवित भगवान है।
- परमपिता परमेश्वर आपकी जीवन-साधना को परिपक्व और प्रखर करे। आपकी अन्तर्निहित शक्तिया जाग्रत हो। जीवन सफलता और समृद्धि की ओर अग्रसर होता रहे। यश एवं कीर्ति के गान जिंदगी के आंगन में गूंजते रहे। उल्लास और उमंगो की नई तरंगो का स्पर्श मिलता रहे। आंतरिक प्रसन्नता व संतोष से अंत:करण का हर कोना सुवासित होता रहे। ऐसी मंगलकामना।
- पारिवारिक आनन्द के लिए गहन अन्तस्तल से निकलने वाले सदभाव की आवश्यकता हैं और इसे केवल वे ही उपलब्ध कर सकते हैं जो स्वयं उदार, सहृदय और सेवा भावनाओ से परिपूर्ण हो। परिवार में स्वर्गीय वातावरण का सृजन केवल जीवन विद्या के आदर्श ही कर सकते है।
- पूर्व अवस्था में वह कार्य करें,जिससे वृद्ध होकर सुख पूर्वक रह सके और जीवन पर्यन्त वह कर्म करें, जिससे मरकर परलोक में सुखपूर्वक रह सके।
- प्रमादपूर्ण जीवन संसार की सारी बुराइयों और व्यसनों का जन्मदाता है।
- प्रामाणिकता मानव जीवन की सबसे बडी उपलब्धि है। वह उत्तरदायित्व निबाहने, मर्यादाओ का पालन करने और कर्तव्यपालन में सतत् जागरुक रहने वालो को ही मिलती है।
- प्राचीन महापुरुषों की जीवन से अपरिचित रहना जीवन भर निरन्तर बाल्य अवस्था में रहना है।
- प्रेम ही आत्मा का प्रकाश है, जो इस प्रकाश मे जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं उसके संसार में शूल नहीं फूल नजर आता है।
- ज्ञान और चरित्र मानव जीवन की कसौटी है।
- संयम जीवन की ऊर्जा के बिखराव एवं विनाश हो रोकता हैं। अनुशासन इसे अपने लक्ष्य की ओर नियोजित करता हैं। दोनो का संगम जीवन को उर्ध्वगामी दिशा देकर आत्मसम्मान को प्रत्यक्ष रुप से बढाता है।
- संसार की सर्वोत्कृष्ट विभूति सदबुद्धि एवं सत्प्रवृति हैं उसे प्राप्त किये बिना किसी का जीवन सफल नहीं हो सकता है।
- समय और श्रम जीवन देवता की सौपी अमूल्य अमानते है।
- सदभावनाओं व सत्प्रवृत्तियों से जिनका जीवन ओतप्रोत हैं, वह ईश्वर के उतना ही निकट है।
- स्वयं में देखे :-मैं कितना सहनशील, विचारशील, दीनबन्धु, राग-द्वेष शून्य, साहसी एवं ओजस्वी हूं। जिस शुभ काम को करने में इतर जनक कॉपते हैं उसी कार्य को मैं किस साहस और बुद्धिमता के साथ पूरा करता हूँ। त्याग का भाव कैसा हैं ? देश सेवा में कितनी रुचि हैं ? आत्मसंयम कितना हैं ? बाह्य विषय-त्याग कैसा हैं ? आत्माभिमुखता कैसी हैं ? इन्ही गुणों का निरीक्षण स्वयं में करना चाहिए। यही गुण मनुष्य जीवन को सफल करने वाले हैं। इन्ही के सहारे मनुष्य नर से नारायण हो सकता है।
- स्वाध्याय को जीवन में निश्चित स्थान दो।
- स्वावलम्बन और सहयोगात्मक उ़द्योग दोनो नागरिक जीवन की कुन्जी है।
- सुगन्ध के बिना पुष्प, तृप्ति के बिना प्राप्ति, ध्येय के बिना कर्म व प्रसन्नता के बिना जीवन व्यर्थ है।
- सत्संग जीवन का कल्प वृक्ष है।
- सत्तातन्त्र का भटकाव देशवासियों को राष्ट्रीय जीवन के प्रति हताशा उत्पन्न करता है।
- उद्योग, साहस, धेर्य, बुद्धि शक्ति और पराक्रम - ये छ: गुण जिस व्यक्ति के जीवन में हैं, देव उसकी सहायता करते है।
- उठो, जागो और तब तक कठोर तप में निरत रहो, जब तक कि जीवन लक्ष्य स्वयं आकर तुम्हे वरण न कर ले।
- उपासना सच्ची तभी हैं, जब जीवन में ईश्वर घुल जाये।
- उस जीवन को नष्ट करने का हमें कोई अधिकार नहीं हैं जिसको बनाने की शक्ति हममें न हो।
- उत्कृष्ट जीवन का स्वरुप हैं - दूसरों के प्रति नम्र और अपने प्रति कठोर।
- उतावलापन जीवन को असफल बनाने वाला एक भयंकर खतरा है।
- दुर्गुण जीवन के लिये साक्षात् विष हैं। उनसे अपने को इस प्रकार बचाये रहना चाहिये, जैसे मॉ बच्चे को सर्तकता पूर्वक आग से बचाये रखती है।
- व्यक्ति के गुण, कर्म व स्वभाव का उत्कृष्ट होना ही उसकी आन्तरिक महानता का परिचायक हैं। अपने दैनिक जीवन में हम कितने संयमी, सदाचारी, शान्त, मधुर, व्यवस्थित, परिश्रमी,पवित्र, सन्तुलित, शिष्ट, कृतज्ञ एवं उदार हैं, इन सदगुणों का दैनिक जीवन में कितना अधिक प्रयोग करते है, यह देख समझ कर ही किसी को, उसकी आन्तरिक वस्तुस्थिति को जाना जा सकता हैं। जिसक दैनिक जीवन फूहडपन से भरा हुआ हैं वह कितना ही जप, ध्यान, पाठ स्नान करता हो आध्यात्मिक स्तर की कसौटी पर ठूंठ या छूंछ ही समझा जायेगा।
- व्यावहारिक जीवन की उलझनों का समाधान किन्ही नयी कल्पनाओं में ही मिलेगा, उन्हें ढूँढो।
- चरित्र जीवन में शासन करने वाला तत्व हैं और वह प्रतिभा से उच्च है।
- जब शरीर आत्मा के अनुकूल नहीं रह जाता, उसके महत् कार्यों को सम्पन्न करने हेतु अयोग्य एवं असमर्थ हो जाता हैं तो उसे प्रसन्न-प्रशांत भाव से मृत्यु देवता के सुपुर्द कर नए परिवेश में , नए सिरे से जीवन की सम्भावना तलाशी जाती हैं। यही महामृत्यु और नवजन्म का मर्म है।
- जहॉं स्थूल जीवन का स्वार्थ समाप्त होता हैं, वहीं मनुष्यता प्रारम्भ होती है।
- जीवन एक पुण्य हैं और प्रेम उसका मधु।
- जीवन बहुमूल्य हैं, उसे निरर्थक प्रयोजनों के लिये खर्च मत करो।
- जीवन बहुत तथ्य जानने से नहीं, बल्कि सत्य की एक छोटी सी अनुभूतिसे ही बदल जाता है।
- जीवन की मंजिल पर रो-रो कर चलना पौरुष का अपमान है।
- जीवन की हार और जीत को भी खेल समझ कर खेले।
- जीवन की सबसे बडी सफलता सदबुद्धि को प्राप्त करना है।
- जीवन की सभी आवश्यकताओं के लिये परमात्मा पर्याप्त है।
- जीवन का सच्चा सदुपयोग ही जीवन का महामन्त्र है।
- जीवन को नियम के अधीन कर देना आलस्य पर विजय पाना है।
- जीवन को वही समझता हैं जो प्रेम करता हैं और दान करता है।
- जीवन के क्रियाकलाप बाहरी अनुशासन के बजाय आत्मानुशासन द्वारा संचालित होने चाहिये।
- जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं , एक वे जो सोचते हैं, पर करते नहीं। दूसरे वे जो करते हैं पर सोचते नहीं।
- जीवन पद्धति को आध्यात्मिक मोड दिए बिना आत्मा के विकास की सम्भावनाऐं उज्ज्वल नहीं हो सकती। जीवन में आध्यात्मिक गुणों को-उदारता, त्याग, सदिच्छा, सहानुभूति, न्यायपरता, दयाशीलता आदि को जागृत करने का काम शिक्षा द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। शिक्षा मनुष्य को ज्ञानवान ही नहीं शीलवान बनाकर निरामय मानवता के अलंकरणो द्वारा उसके चरित्र का श्रंगार कर देती है। शिक्षा सम्पन्न व्यक्ति ही वह विवेक-शिल्प सिद्ध कर सकता हैं, जिसके द्वारा गुण, कर्म व स्वभाव को वांछित रुप में गढ सकना सम्भव हो सकता है।
- जीवन संवेदना का पर्याय हैं। संवेदना के अंकुरण, प्रस्फुटन एवं अभिवर्द्धन के अनुरुप ही इसका विकास होता है। जीवन विद्या के मर्मज्ञ-नारद।
- जीवन संगीत संयम के साज पर बजता हैं। संयम अतियों से उबरने एवं मध्यम में ठहरने का नाम है।
- जीवन दरद का झरना हैं, जो भी जीते हैं, दरद भोगते हैं, लेकिन हमें दरद भोगते हुए जागना हैं, यही वो जीवन की सत्य साधना हैं। दरद नियति के ऑगन में पडी निहाई है, दरद भगवान के हाथों का हथोडा हैं, भगवान हम पर चोटें देकर, हमें सवॉंरता और गढता हैं, यह बात सुनिश्चित हैं कि आदमी दरद में विकसित होता, खूबसूरत बनता और बढता है।
- जीवन देने के लिये में अपने पिता का ऋणी हूँ , लेकिन अच्छे जीवन के लिये अपने शिक्षक ऋणी हूं।
- जीवन जीने की कला- यदि जीवन में गंतव्य का बोध न हो तो भला गति सही कैसे हो सकती हैं। और यदि कहीं पहुंचना ही न हो तो संतुष्टी कैसे पायी जा सकती हैं। जो जीवन जीने की कला से वंचित हैं समझना चाहिए कि उनके जीवन में न तो दिशा हैं और न कोई एकता है। उनके समस्त अनुभव निरे आणविक रह जाते हैं। उनसे कभी भी उस ऊर्जा का जन्म नहीं हो पाता, जो कि ज्ञान बनकर प्रकट होती हैं। ऐसा व्यक्ति सुख-दु:ख तो जानता है, पर उसे कभी भी आनन्द की अनुभूति नहीं होती।जीवन में यदि आनन्द पाना हैं तो जीवन को फूलो की माला बनाना होगा। जीवन के समस्त अनुभवों को एक लक्ष्य के धागे में कलात्मक रीति से गूंथना होगा। जो जीने की इस कला को नही जानते हैं वे सदा केलिए जिंदगी की सार्थकता एवं कृतार्थता से वंचित रह जाते है।
- जीवन अवसर हैं जिसे गंवा देने पर सब कुछ हाथ से गुम हो जाता है।
- जीवन अन्त तक लडते रहने, प्रभावशाली युद्ध नीति और विजयी परियोजनाओं से असफलता को सफलता में बदल देने का खेल है। असफल लोग तय करले तो संघर्ष का दूसरा मौका सामने होगा।
- जो ईश्वर पर विश्वास रखतते हैं वे निजी जीवन में उदार बनकर जीते है।
- जो सदगुण अपने में नहीं है, उनकी अपने में कल्पना करो और उन्हे अपने जीवन का अभिन्न अंग बना डालो।
- जो उदारता, त्याग, सेवा और परोपकार के लिए कदम नहीं बढा सकता, उसे जीवन की सार्थकता का श्रेय और आनन्द भी नहीं मिल सकता।
- जो वास्तविक मौन को साध लेता हैं , वह भौतिक जीवन में गम्भीर, शान्त, सम्माननीय और वजनदार प्रतीत होता हैं, और आध्यात्मिक जीवन में ईश्वरोन्मुख बनता चला जाता है।
- जो अपनी जीवन शैली को नहीं बदल सकते हैं, उनमें हमारी तप-शक्ति भी विशेष काम नहीं कर पाती। परमपूज्यगुरुदेव।
- जो अपने लिये नहीं ओरो के लिये जीते हैं वे जीवन मुक्त है।
- जुबान की अपेक्षा, जीवन से शिक्षा देना कहीं अधिक प्रभावशाली है।
- नरक और कहीं नहीं, महत्वाकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमने वाले जीवन में है।
- नारी का असली श्रंगार, सादा जीवन उच्च विचार।
- नैतिकता एक गरिमापूर्ण जीवन शैली है।
- नेतृत्व जीवन के क्रिया-कलापों द्वारा किया जाता हैं, बातों से नही।
- अध्यात्म कही जाने वाली जीवन-विद्या एक एसा तथ्य हैं , जिसके उपर मानव-कल्याण की आधार-शिला रखी हुई है। उसे जिस सीमा तक उपेक्षित एवं तिरस्कृत किया जायेगा, उतना ही दु:ख दारिद्रय बढता जाएगा। हमारी सम्पन्नता, समृद्धि, शान्ति, समर्थता एवं प्रगति का एक मात्र अवलम्बन जीवन विद्या ही हैं। यदि हमें सुखी और प्रगतिशील होकर जीना हैं तो स्मरण रखा जाना चाहिये कि दृष्टिकोण में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का समुचित समन्वय नितान्त अनिवार्य हैं। इसकी विमुखता सर्वनाश को सीधा निमन्त्रण देने के बराबर हैं।
- अपनी बुराई अपने इसी जीवन में मरने दो।
- अपने जीवन को अन्तरात्मा द्वारा निर्धारित उच्चतम मानदण्डो पर जीने का प्रयास करे।
- आध्यात्मिक वातावरण श्रेष्ठतर मानव जीवन को गढने वाली प्रयोगशाला है।
- आत्मा का साक्षात्कार ही मनुष्य की सारी सफलताओं का प्राण है। यह तभी संभव है, जब मानव अपने वर्तमान जीवन को श्रेष्ठ, उदार तथा उदात्त भावनाओं से युक्त करने का प्रयास करता है।
- आज का जीवन बीते कल की परछाई है।
- असली आत्मवेत्ता अपने आदर्श प्रस्तुत करके अनुकरण का प्रकाश उत्पन्न करते हैं और अपनी प्रबल मनस्विता द्वारा जन-जीवन में उत्कृष्टता उत्पन्न करके व्यापक विकृतियों का उन्मूलन करने की देवदूतो वाली परम्परा को प्रखर बनाते है।
- अच्छे विचार मनुष्य को सफलता और जीवन देते है।
- अन्त:करण में ईश्वरीय प्रकाश जाग्रत करना ही मनुष्य जीवन का ध्येय है।
- गंभीरतापूर्वक विचार किया जाये तो प्रतीत होगा कि जीवन और जगत् में विद्यमान समस्त दु:खों के कारण तीन हैं - १-अज्ञान २-अशक्ति ३-अभाव। जो इन तीन कारणों को जिस सीमा तक अपने से दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा।
- गीता का पठन-मनन करने वाला प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दे सकता हैं । प्रतिदिन गीता का पाठ, विचार करना शुरु कर दें। गीता के अनुसार अपनी व्यवहार करें, जीवन बनायें तो दु:ख, सन्ताप, हलचल सब मिट जायेगी।
- लोग प्यार करना सीखे। हममें, अपने आप में, अपनी आत्मा और जीवन में , परिवार में, समाज में, कर्तव्य में और ईश्वर में दसों दिशाओं में प्रेम बिखेरना और उसकी लौटती हुयी प्रतिध्वनि का भाव भरा अमृत पीकर धन्य हो जाना, यही जीवन की सफलता है।
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Monday, September 1, 2008
जीवन
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